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Friday, September 21, 2018

भले लोगों से अत्याचारियों का युद्ध था कर्बला…हमारी ओर से भी श्रद्धांजलि……एस एम् मासूम

इंदौर की अर्चना जी का शुक्रिया जिन्होंने इस पोस्ट को बेहतरीन अंदाज़ मैं पढ़ा.. आप सब भी सुने.
Moharram 2010 Layout (1)
इमाम हुसैन की शहादत को नमन करते हुए हमारी ओर से श्रद्धांजलि…इस लेख़ के ज़रिये मैंने एक कोशिश की है  यह बताने की के धर्म कोई भी हो जब यह राजशाही , बादशाहों, नेताओं का ग़ुलाम बन जाता है तो ज़ुल्म और नफरत फैलाता    है और जब यह अपनी असल शक्ल मैं रहता है तो, पैग़ाम ए मुहब्बत "अमन का पैग़ाम " बन जाता है.  …..एस एम् मासूम
moon एक दिन बाद माह ए मुहर्रम का चाँद आसमान पे दिखने लगेगा. मुहर्रम इस्लामिक  कैलेंडर का पहला महीना है. लेकिन इसका स्वागत मुसलमान नम आँखों से करते हैं, खुशिया नहीं मनाते , क्योंकि इसी दिन हज़रत मुहम्मद (स.ए.व) के नवासे इमाम हुसैन (ए.स) को  एक दहशतगर्द गिरोह ने ,कर्बला मैं उनके परिवार के साथ घेर के 10 मुहर्रम 61 हिजरी को भूखा प्यासा शहीद कर दिया.




अक्सर लोगों ने मुझसे यह सवाल किया की भाई आप कौन से मुसलमान हैं जो "अमन का पैग़ाम" ले के आये? ना आप जालिमों का साथ देते हैं, ना ही बेगुनाहों की जान लेने वाले दहशतगर्दों का साथ देते है. और हमेशा इंसानियत की बातें किया करते हैं. भाई मैं मुसलमानों के उस गिरोह से ताल्लुक रखता हूँ, जो बादशाहों के बनाए इस्लाम की जगह कुरान के बताए इस्लाम पे चलता है. और  इमाम हुसैन (ए.स) , जिसने १४०० साल पहले ज़ुल्म और आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, हमारे लीडर हैं. अधिकतर मुसलमान इमाम हुसैन (अलैहिस  सलाम) को मानते हैं और उनके बताए रास्ते पे अमन और शांति फैलाते हुए, सबको साथ ले के चलते हैं. 
एक बात यहाँ कहता चलूँ की राजशाही और तानाशाही का नाम धर्म  नहीं है. और आज जो  चेहरा सभी  धर्मो का दिखाई  देता है, वो  नकली मुल्लाओं,पंडितों  और निरंकुश शासकों के बीच नापाक गठजोड़ का नतीजा है. ऐसा ही चेहरा इस्लाम का उस समय यजीद की बादशाहत मैं होने लगा था ,और उस से आज़ादी दिलवाई इमाम हुसैन (अलैहिस  सलाम) ने अपनी क़ुरबानी कर्बला मैं दे के. 


KB 10 मुहर्रम 61 हिजरी की  जंग ए कर्बला मैं  इमाम हुसैन की क़ुरबानी को केवल इस्लाम को मानने वाले ही नहीं सारा विश्व आज तक नहीं भुला सका है. हर साल १० मुहर्रम को मुसलमान इमाम हुसैन (अ.स) की क़ुरबानी  को याद करते हैं. 
इमाम हुसैन (अ.स) ने क़ुरबानी दे के उस इस्लाम को बचाया जिसका पैग़ाम मुहब्बत ,और शांति थी .सवाल यह पैदा होता है की इस्लाम किस से बचाया? इमाम  हुसैन  (अलैहिस  सलाम) ने सच्चा इस्लाम  बचाया ,उस दौर के ज़ालिम बादशाह यजीद से   जिसने ज़ुल्म और आतंकवाद का इस्लाम फैला  रखा था जिसको को बेनकाब करके सही इस्लाम पेश किया इमाम हुसैन(अ.स) ने. 
यह १४०० साल पहले की बात थी लेकिन आज भी वही सूरत ए हॉल दिखाई देती है. एक गिरोह , जिहाद, फतवा और इन्केलाब के नाम पे ज़ुल्म को इस्लाम बताने पे लगा हुआ है. यह आतंकवाद को पसंद करते हैं, बेगुनाह की जान का चले जाना इसके लिए कोई माने  नहीं लगता. आज भी यही इमाम हुसैन (अ.स) को मानने  वाले ,अमन और प्रेम का सदेश दिया करते हैं. 
कर्बला का युद्ध  सदगुणों के सम्मुख अवगुणों और भले लोगों से अत्याचारियों का युद्ध था. कर्बला की घटना में यज़ीद की सिर से पैर तक शस्त्रों से लैस ३० हज़ार की सेना ने इमाम हुसैन (अ) और उनके 72 वफ़ादार साथियों को घेर लिया और अन्तत: सबको तीन दिन भूखा और प्यासा शहीद कर दिया. 
हर वर्ष इस मुहर्रम के शुरू होते ही मुसलमान काले कपडे पहन के, इमाम हुसैन (ए.स) की क़ुरबानी के  वाकए(मजलिसों /शोक सभाओं)  को सुनते हैं और सब को बताते हैं कैसे इमाम हुसैन (ए.स) पे ज़ुल्म हुआ, कैसे उनके ६ महीने के बच्चे को भी प्यासा शहीद कर दिया? और ग़म मैं आंसू  बहाते हैं. मुहर्रम का महीना शुरू होते ही यह  सिलसिला शुरू हो जाता है.
20070130_03मुहर्रम के आलम, ताज़िया के जुलूस सभी ने देखे होंगे लेकिन यह कम लोग समझ पाते हैं की यह क्या है.
जब यजीद की फ़ौज ने १० मुहर्रम को इमाम हुसैन (ए.स) को, उनके दोस्तों और परिवार के साथ शहीद कर दिया तो उनको कैदी बना के कर्बला से शाम (सिरिया) १६०० क म  पैदल ,ले के गए. 
यह अलम और ताज़िया का जुलूस उस ग़म को याद करने के लिए निकाला  जाता है.इमाम हुसैन की  बहन हज़रत ज़ैनब (स) और इमाम हुसैन (अ) के सुपुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) को अन्य महिलाओं और बच्चों के साथ क़ैदी बनाया गया.
ऐसे समय में शत्रु स्वंय को विजयी समझ रहा था किंतु समय बीतने के इतिहास से सिद्ध हो गया कि ऐसा नहीं था. आज उस ज़ालिम बादशाह यजीद का नाम लेने वाला कोई नहीं. लेकिन आज हुसैन (ए.स) को याद कर के , उनपे आंसू बहाने वालों की तादात बहुत है. यह वही मुसलमान हैं जो आज भी इमाम हुसैन (ए.स) की तरह अमन पसंद हैं.
इमाम हुसैन ने एक सुंदर वास्तविकता का चित्रण किया और वह यह है कि जब भी अत्याचार व अपराध व बुराईयां मानव के समाजिक जीवन पर व्याप्त हो जाएं और अच्छाइयां और भलाइयां उपेक्षित होने लगें तो उठ खड़े होकर संघर्ष करना चाहिए और  समाज में जीवन के नये प्राण फूंकने की कोशिश करनी  चाहिए. यही काम आज भी "अमन का पैग़ाम" करने की कोशिश कर रहा है.  
१० मुहर्रम के इस दिन को जब इमाम हुसैन (अलैहिस  सलाम) का क़त्ल हुआ था आशूर भी कहा जाता है. आशूर की घटना और कर्बला का आंदोलन सदैव ही विश्व के स्वतंत्रता प्रेमियों के ध्यान का केन्द्र रहा है.
bannersss4 मुझे फख्र इस बात का होता है की मै उस देश का निवासी हूँ जिसकी खाहिश मेरे बादशाह इमाम  हुसैन (ए.स) ने की  थी. मुझे इस बात पर और भी फख्र होता है की हमारे दुसरे मज़हब के भाई भी इमाम हुसैन (अस) को वैसे ही पहचानते हैं जैसा की पहचानने का हक़ है. हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का कहना था की "मैंने  हुसैन से सीखा है अत्याचार पर विजय कैसे प्राप्त होती है. मेरा विश्वास है कि इस्लाम अपने विश्वासियों ( अनुयायों ) द्वारा तलवार के उपयोग पर निर्भर नहीं करता है बल्कि उनकी प्रगति हुसैन के बलिदान का परिणाम है".
मुहर्रम  का  चाँद  देखते  ही , ना  सिर्फ  मुसलमानों  के  दिल  और  आँखें  ग़म  ऐ  हुसैन  से  छलक  उठती  हैं , बल्कि हिन्दुओं  की  बड़ी   बड़ी   शख्सियतें  भी  बारगाहे  हुस्सैनी  में  ख़ेराज ए अक़ीदत पेश  किये  बग़ैर  नहीं  रहतीं.

इमाम हुसैन (अलैहिस सलाम  ) ने कहा ऐ नाना, मैंने अल्लाह के दीन को आप से किये गए वादे के अनुसार कर्बला के मैदान में अपने तमाम बच्चों, साथियों और अंसारों की क़ुर्बानी देकर बचा लिया! नाना, मेरे ६ महीने के असग़र को तीन दिन की प्यास के बाद तीन फल का तीर मिला !
मेरा बेटा अकबर, जो आप का हमशक्ल था, उसके सीने में ऐसा नैज़ा मारा गया की उसका फल उसके कलेजे में ही टूट गया ! मेरी बच्ची सकीना को तमाचे मार-मार कर इस तरह से उसके कानो से बालियाँ खींची गयी के उसके कान के लौ कट गए ! नाना मैंने दिखा दिया दुनिया को अपनी क़ुरबानी देके की वो इस्लाम जो आपने दिया था ज़ुल्म और दहशतगर्दों का इस्लाम नहीं बल्कि अमन  शांति और सब्र का इस्लाम है. 


अवश्य पढ़ें हुसैन और भारत विश्वनाथ प्रसाद माथुर * लखनवी मुहर्रम , १३८३ हिजरी
दुआ करो के हमेशा मुहब्बतें बरसें, 
मुहब्बतें हैं  इबादत की कीमती गठरी
न कोई ज़ुल्म न ज़ालिम हमारे बीच रहे,
ज़मीं पे अम्न  का रुतबा हो,खुश हो हर बशरी.
इमाम हुसैन की शहादत को नमन करते हुए हमारी ओर से भी श्रद्धांजलि.



















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42 टिप्पणियाँ:

  1. हमारी ओर से श्रद्धांजलि.

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  2. इमाम हुसैन (अ.स.) की याद आते ही आँखे नाम हो जाती हैं, और कुछ कहने करने की हिम्मत नहीं रहती.... यह कैसा प्रेम है! क्या इससे भी सच्चा कोई प्यार हो सकता है? कुछ और अब लिख नहीं पाउँगा..

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  3. पूरी कथा पहली बार ही जानी, विनम्र आभार।

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  4. हमारी ओर से श्रद्धांजलि

    Saidaiv Shanti ki taraf chale, yehi jindgai ka wassul hai

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  5. मैने भी इस एतिहासिक घटना को पहली बार जाना। इमाम हुसैन की शहादत के लिये मेरी भी विनम्र श्रद्धाँजली। आखिरी विजय तो हमेशा अमन की होती है। शुभकामनायें।

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  6. इस लेख के लिए हार्दिक शुभकामनायें क़ुबूल करें !

    बहुत खूबसूरत और आम आदमी की समझ में आने वाला लेख लिखा है आपने ! !

    इमाम हुसैन की कुर्बानी के जुलूस बचपन से देखते रहे हैं , जिस दर्द को महसूस करते हुए लोग उनको याद करते हैं ! दर्द और प्यार का अहसास दिलाता वह मंज़र भूला नहीं जा सकता...

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  7. मासूम भाई ,
    आप ऊपर के कमेन्ट कर्ता देखिये और उनके शब्द नोट करें !
    विभिन्न क्षेत्रों में मशहूर ये ब्लागर, इमाम हुसैन की शहादत में अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देकर गए हैं ....
    यही है आपकी जीत और सबूत कि यहाँ प्यार की कोई कमी नहीं ...आपके कार्य के लिए हार्दिक शुभकामनायें !

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  8. संजय भास्कर जी ,अलबेला खत्री जी, तर्केश्वेर जी आप ने अमन और स्जमती दूत को श्रद्धांजलि अर्पित की मेरे दिल मैं आप सब के लिए इज्ज़त बढ़ गयी. आप का बहुत बहुत शुक्रिया

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  9. मेरी ओर से श्रद्धांजलि...जो जानकारी दी है उसके लिए शुक्रिया...सभी अपनी सोच में बदलाव लाएं तो देश की तस्वीर ही कुछ और होगी...आभार

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  10. प्रवीण पाण्डेय जी, आप ने समय निकल के इस लेख़ को पढ़ा ,आप का बहुत बहुत शुक्रिया..

    निर्मला कपिला जी आप का शुक्रिया की आप ने लेख़ को पढ़ा और समझा.. आप सच कहती हैं "आखिरी विजय तो हमेशा अमन की होती है.

    शाहनवाज़ भाई आज १४०० साल बाद भी अगर इस इमाम हुसैन के नाम को याद करने पे आँखें बहर आयें तो यही सच्ची मुहब्बत है..


    सतीश सक्सेना जी आप की मुहब्बत है, इस लिए यह पैग़ाम लोगों तक पहुँच रहा है...

    आप सब ना साथ होते तो यह शांति सन्देश आगे ना बढ़ पाता .
    आभार

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  11. श्रद्धांजलि .... हमारी ओर से श्रद्धांजलि ....

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  12. मासूम भाई
    यह सन्देश आम जन तक जाना चाहिए , क्यूंकि दुनिया वास्तविकता को समझे बगेर कदम उठती है ....इमाम हुसैन की शहादत के बारे में पढ़ा था ....और आज भरे दिल से उन्हें श्रधांजलि अर्पित करता हूँ ....मानवता के लिए उनका वलिदान अविस्मर्णीय है ...शुक्रिया

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  13. चंद आंसू ...
    दुख ,
    और एक अहसास,

    बस यही कैफ़ियत होती है हरेक इंसान की तरह मेरी भी , जब भी मैं शहादते इमाम अलैहिस्-सलाम के बारे में पढ़ता हूं ।
    पैग़ाम ही काफी नहीं है अमन के लिए बल्कि अमल भी जरूरी है और यह काम बिना ईमान ओ यकीन के और बिना कुरबानी दिए अंजाम नहीं दिया जा सकता । यज़ीदी विचारधारा आज भी ज़िंदा है और हुसैनी अज़्मत को मिटाने के लिए उसे लगातार घायल किए दे रही है । जिन्हें हिमायते हुसैन के लिए दौरे हयाते हुसैन नसीब न हो सका और वे रंजीदा हैं तो वे जान लेँ कि न तो हक़ के लिए मौत है और न ही शहीदाने हक़ के लिए ।आज भी हुसैन ज़िंदा हैं , मुजस्सम । आज भी फ़िक्रे हुसैन ज़िंदा और ग़ालिब है ,हरेक फ़ितरते इंसानी में। आज भी हामियाने हुसैन क़ियामे अमन के लिए सरगर्म हैं । जो रंजीदा हैं वे इंसानियत के रंज दूर करने के लिए अपनी जानें दें । अगर वे अमन की हिफ़ाज़त की ख़ातिर अपनी जानें आज देते हैं तो वे गिने जाएंगे करबला के शहीदों के साथ ही।
    काश ! यह सआदत मुझे नसीब हो जाए और अगर न हो पाई तो ...
    यह इतनी बड़ी महरूमी होगी कि उसके लिए अनंत काल का मातम भी नाकाफ़ी होगा ।

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  14. मासूम भाई, कमेन्ट बॉक्स नहीं खुल रहा है लिहाजा मेल से भेज रही हूँ, उसको पोस्ट कर दें.


    मुहर्रम के ताजिये और हुसैन की शहादत से कुछ हद तक वाकिफ हूँ क्योंकि मेरे आस पास बहुत से मुस्लिम भाई रहते हैं और ताजिये भी पास में ही रखे जाते हैं. रात दिन बजने वाले गम भरे गीतों में ये कहानी बयान होती है और अब तो लगता है कि यहाँ भी इतने दिनों तक गम का माहौल बना रहता है. मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.

    रेखा श्रीवास्तव

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  15. बचपन सेलेकर अपनी शादी होने तक ताजिये देखती रही हूँ...परअब तक पता नही था ये होता क्यों है...आज आपकी पोस्ट ने आँखें नम कर दी...मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजली .....

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  16. दुआ करो के हमेशा मुहब्बतें बरसें,
    मुहब्बतें हैं इबादत की कीमती गठरी
    न कोई ज़ुल्म न ज़ालिम हमारे बीच रहे,
    ज़मीं पे अम्न का रुतबा हो,खुश हो हर बशरी.

    हमारी ओर से भी श्रद्धांजलि... शुभकामनायें और शुक्रिया!

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  17. इमाम हुसैन की कुर्बनी की कथा मैंने अपने हैदराबाद प्रवास के दैरान सुनी थी. ऐसी कुर्बानी पर किसकी आँखें नम नहीं होंगी.

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  18. वीना जी @ आपके विचार उत्तम हैं और श्रद्धांजलि के लिए शुक्रिया..

    दिगम्बर नासवा @ जी आप का एहसान है, श्रद्धांजलि देने के लिए..

    केवल राम @ बहुत सुंदर सन्देश और आप ने इस लेख़ को पढ़ा आप का शुक्रिया..

    सुरेन्द्र सिंह " झंझट "@ शायद आप ने अंग्रेजी मैं श्रद्धांजलि देने के कारण पोस्ट हटा दी. आप टिप्पणी किसी भी बोली मैं दाल सकते हैं.

    अनवर जमाल साहब @ आप के आंसू जाया नहीं जाएंगे..

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  19. अर्चना जी @ आप का बहुत बहुत शुक्रिया इस पोस्ट को इतने बेहतरीन अंदाज़ मैं पढ़ा.. आप का योगदान अमूल्य है..

    अंजना और भूषण जी आप की श्रद्धांजलि के लिए शुक्रिया. जी भूषण भाई हैदराबाद मैं मुहर्रम के जुलूस बहुत निकलते हैं...

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  20. राजशाही और तानाशाही का नाम धर्म नहीं है. और आज जो चेहरा सभी धर्मो का दिखाई देता है, वो नकली मुल्लाओं,पंडितों और निरंकुश शासकों के बीच नापाक गठजोड़ का नतीजा है.


    ..

    सत्य वचन. यह अच्छा किया आप ने बता दिया बहुतों का शक का इलाज किया..

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  21. tamam jankari aur itni sundar post ke liye aabhar.

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  22. इमाम हुसैन की शहादत मानवता के लिये हिंसा पर अहिंसा की विजय है।
    हज़रत इमाम हुसैन का यह कथन कि "मैं हिन्दुस्तान जाना चाहता हूं वहां मुसलमान तो नहिं मगर इन्सान रहते है" अहिंसा की और ही संकेत था,कि हिन्दुस्तान में अहिंसा पूर्णरूप से पालन की जाती है।
    अमन का पैगाम मात्र युद्ध शान्ति की तरह नहिं है। या शर्तों पर युद्ध में समर्पण की तरह नहिं लेना चाहिए।
    हिंसा से मुक्त विचार ही जगत में अमन शांति और प्रेम स्थापित कर सकते हैं।

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  23. विनम्र श्रद्धाँजली।
    ...इस लेख के लिए हार्दिक शुभकामनायें क़ुबूल करें....मासूम जी

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  24. सारथी @जी आप ने लेख़ का सार समझ लिया.धन्यवाद

    सुबीर रावत@ आप ने समय दिया और लेख़ को पढ़ा इसके लिए धन्यवाद्.

    सुज्ञ @ आप ने सही समझा की "इमाम हुसैन की शहादत मानवता के लिये हिंसा पर अहिंसा की विजय है।"
    हम सबको इमाम हुसैन (ए.स) से ही सीखना चाहिए की अहिंसा क्या है?

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  25. मासूम्@इमाम हुसैन नें तो जान देकर भी अहिंसा की रक्षा की, हमें भी पूर्ण अहिंसा के लिये जान की परवाह न करनी चाहिए, उनकी शहादत पर दुखी होने की जगह उनके विचारों का अनुकरण करना चाहिए।

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  26. (एक शायर की ज़ुबान में )
    आह ने दिल का चैन लिखा है,
    आँखों ने नूर-ए- ऐन लिखा है,
    मैंने कागज़ पर रख दिए आंसू,
    लोग समझ रहे हैं हुसैन लिखा है.

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  27. सुज्ञ @ जी इमाम हुसैन (ए.स) की जान क्यूँ गयी? इसलिए की जालिमों के साथी अधिक थे और हक के साथी कम. हमें कोशिश करनी चाहिए की अहिंसा के रास्ते पे चलने वालों का साथ दें. ऐसा करने सी ही समाज मैं शांति काएम रहेगी.

    सुज्ञ जी जो बेटा अपने बाप के मारने पे दुखी ना हो सके वोह अपने बाप के विचारों का अनुकरण कैसे कर सकता है? इमाम हुसैन (ए.स) के विचारों का अनुकरण करने वाले ही उनकी शहादत पे दुखी होते हैं..

    ReplyDelete
  28. मैंने कागज़ पर रख दिए आंसू,
    लोग समझ रहे हैं हुसैन लिखा है.

    बहुत खूब जीशान भाई

    ReplyDelete
  29. पहले की टिप्पणी मैं कुछ टाइपिंग ग़लती थी..यह सही टिप्पणी है..

    सुज्ञ @ जी इमाम हुसैन (ए.स) की जान क्यूँ गयी? इसलिए की जालिमों के साथी अधिक थे और हक के साथी कम. हमें कोशिश करनी चाहिए की अहिंसा के रास्ते पे चलने वालों का साथ दें. ऐसा करने सी ही समाज मैं शांति काएम रहेगी. फिर किसी हुसैन को जान देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी..

    सुज्ञ जी जो बेटा अपने बाप के मरने पे दुखी ना हो सके वोह अपने बाप के विचारों का अनुकरण कैसे कर सकता है? इमाम हुसैन (ए.स) के विचारों का अनुकरण करने वाले ही उनकी शहादत पे दुखी होते हैं.

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  30. इस जानकारी के लिए आभार।

    ReplyDelete
  31. विनम्र श्रद्धाँजली।
    ...इस लेख के लिए हार्दिक आभार क़ुबूल करें....मासूम जी.

    ReplyDelete
  32. dil se ek sachchi vinamra shraddhanjali iss nachij ki aur se bhi.....:)

    ReplyDelete
  33. ये कहानी पहली बार ही जानी .विनर्म आभार.

    ReplyDelete
  34. ZEAL @दिव्या जी आप का धन्यवाद् , आप ने लेख़ पढ़ा ख़ुशी हुई.

    अमित शर्मा@ जे आप की दुआओं और तारीफ के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्. आभार

    Mukesh Kumar Sinha @ श्रधांजलि के लिए आप का शुक्रिया भाई...आप के ब्लॉग पे गया बहुत अच्छा लगा.

    शिखा जी @ आप ने लेख़ पढ़ा ख़ुशी हुई.मेरा सौभग्य की आप का ज्ञान बढ़ा..

    आप सब भी कोई लेख़ अमन के पैग़ाम पे हो सके तो भेजें..आभार

    ReplyDelete
  35. Thanks for visiting this new url of aman ka paigham.

    follow kerna na bhoolein.

    thanks

    ReplyDelete
  36. इमाम हुसैन की शहादत के बारे में
    पढ़ कर मन रंजीदा हो उठा है
    मैं अपनी जानिब से
    उनके लिए खिराज-ए-अक़ीदत पेश करता हूँ
    और
    ऐसी तफ्सीली मालूमात के मुहैय्या करवाने के लिए
    आपका शुक्रिया अदा करता हूँ .

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  37. पढ़ाने के लिए शुक्रिया। अच्छे से समझाने का प्रयास किया है आपने।

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  38. पढ़ाने के लिए शुक्रिया। अच्छे से समझाने का प्रयास किया है आपने।

    ReplyDelete
  39. हर जगह से अमन का पैगाम आना चाहिए!
    अब लबों पर शान्ति का ही नाम आना चाहिए।।

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  40. आभार इस संदेश एवं जानकारी का.

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