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Sunday, July 8, 2018

जो दबाकर फिरका परस्ती को झोंकों में मजलूमों को खुशनुमा हवा देते हैं| सनोवर अली


sanowar Ali आज अमन का पैग़ाम पे कानपुर के सनोवर अली साहब का तोहफा कुबूल करें.कुछ येसी हवाओं (लोगों) की तलाश है मुझको जो दबाकर फिरका परस्ती को झोंकों में
मजलूमों को खुशनुमा हवा देते हैं.


कुछ येसी हवाओं (लोगों) की तलाश है मुझको
जो गैरों के जख्मों को सिफ़ा देते हैं


पोंछ कर अश्क उनकी आँखों से
लबों पर तबस्सुम बिखेर देते हैं

जो दबाकर फिरका परस्ती को झोंकों में
मजलूमों को खुशनुमा हवा देते हैं

जो ढँक कर आबरूये गैरतमंदों की
गुनेहगारों के चेहरे से नकाब हटा देते हैं

जो रौशन शमा अहलेवतन में किया करते हैं
जालिमों के घर के चराग बुझा देते है

जो छोड़ कर इंसानियत के आशियाने को
जुल्मो सितम की मजहबी दिवार गिरा देते है

जो न कर परवाह चांदनी स्याह रातों की
भटके मुशाफिरों को मंजिल का पता देते है

जो ख़त्म कर सियासी मजीद तल्खी को
बारहा रूठे हुयें को अपनों से मिला देते हैं

खुदा से खिदमत_खल्क की तौफिक मिली इंशा को
बोझ अपना समझ गैरों का उठा देते हैं

न समझ छोटा बड़ा इस दानिश्वरों की दुनिया में
गुर्बतों मुफ्लिशों पर अपना माल ओ ज़र  लुटा देते हैं

जो जमी पर कायनात की रानाईयाँ समेटे हुए
एखलाक से अपने संदिलों की महफिल को खुशनुमा बना देते हैं

**सनोवर** येसी हवाओं को सांसो में बसा लेंगे
जो इंसानियत की खातिर अपनी खुशबू को लुटा देते हैं
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