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चाय यह अंदाज़ भी डा मुकेश चित्रवंशी के साथ |

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कुछ और ही कहती है रंगत कांच के इन प्यालों की सच में सूरत चाय की असल तो बस यही है। साहिल आज भी दुनियां भर के करोड़ों लोगों की सुबह तब तक नही...

कुछ और ही कहती है रंगत कांच के इन प्यालों की
सच में सूरत चाय की असल तो
बस यही है।
साहिल
आज भी दुनियां भर के करोड़ों लोगों की सुबह तब तक नहीं होती जब तक के चाय का एक गर्म प्याला उनकी पेश ए नज़र ना हो,,, और साहब जिस रोज़ चाय वक़्त पर ना मयस्सर हो तो अच्छे अच्छे लोगों का पूरा दिन तमाम मनहूसियतों के बीच गुज़रता है
कहते हैं कि दुनियां में चाय की ईजाद तकरीबन 2737 बी सी में चीन के महान शासक शैननंग नें की थी और इसके पीछे भी एक बड़ा ही दिलचस्प वाकया है,,, और यकीन मानिए अगर यह ये न गुज़रा होता तो शायद आज चाय का कहीं भी कोई वजूद ना होता।
कहते हैं कि इस चीनी सम्राट को अल सुबह गर्म पानी से भरे प्याले पीने की आदत थी एक दफा महल का शाही ख़ानसामा सम्राट के पीनें के लिए पानी उबाल रहा था कि तभी हवा के झोंके के साथ बाहर खिड़की से कुछ सूखी पत्तियां भी आकर पानी में गिर गईं जिसको वो देख ना पाया तो वो पत्तियां भी उसी पानी के साथ साथ उबल चुकी थी लेकिन अब क्या किया जाए चूंकि सम्राट सोकर उठ चुके थे और आदतन उन्हें गर्म पानी पीना था,,,, इधर ख़ानसामा एक अजीब से ख़ौफ से गुज़र रहा था क्योंकि उसके सहायक नें उस पानी को छानकर सम्राट के सामने प्यालों में भर कर रख दिया था,,,, जिसे वो आहिस्ता आहिस्ता पी रहे थे लेकिन आज सम्राट को पानी का ज़ायका कुछ अलग सा लगा,, जिसकी भीनी ख़ुशबू और ख़ुश क़िस्म ज़ायके के साथ वो सारा पानी पी गये.... लेकिन ठीक कुछ मिनटों के बाद सम्राट ने अपनी तबीयत में एक अजब सी फ़ुर्ती और बला की ताज़गी को महसूस किया,, फिर उसनें तुरंत अपने ख़ानसामा को तलब किया और पानी के कुछ अलग से ज़ायके और तासीर के बावत पूछताछ की तो डर के मारे वो बेचारा कुछ बता ना सका बस इतना ही कहा के हुजूर जिस झाड़ की पत्तियों को शाही हकीम शराब की खुमारी को मिटाने के लिए बतौर इलाज पीने वालों को दिया करते थे आज हवा के झोंके के साथ उबलते पानी में उसकी चंद पत्तियां अपनें आप आ गिरी थीं..... लेकिन आप तक वो पानी पहुंच चुका था,,, इसलिए मारे डर के हम लोग कुछ कह ना सके,,, बेहद डर और शर्मिंदगी के साथ उसनें अपनी ग़लती को मान लिया और मांफ़ी तलाफी के साथ जान बक्श देने की मिन्नतें करने लगा तो सम्राट ने हंसते हुए कहा कि आज के बाद से रोज़ वही पत्तियां मुझे पानी में उबाल कर दी जाए।
तो जनाब ए आली इस तरह की एक मज़ेदार ग़लती की वजह से चाय की ईजाद हो गई।

फिर कई सालों के बाद चाइना में टैंग साम्राज्य की शुरुआत के साथ आम लोगों ने भी इसे पीना शुरू कर दिया था और क्योंकि ये चीन की उत्पत्ति थी तो मुमकिन है कि इसीलिए इसे चाय का नाम दिया गया होगा।
उस दौर में किसी मेहमान को चाय पेश करना बड़े ही अदब के साथ ही साथ ख़ासे सम्मान का सूचक था और आज भी ये मेहमान नवाज़ी की परंपरा पूरे विश्व में का़यम है।
जापान में भी आने वाले मेहमानों को चाय पिलाने का एक अलग ही तरह का रिवाज है जिसे द वे ऑफ टी कहते हैं जो आज भी वहां पर निभाया जाता है जिसे देखना अपने आप में एक कमाल का अनुभव है.... अपने विदेश प्रवास के दौरान मुझे कई बार इस तरह के पारंपरिक चाय पीने के निमंत्रण मिलते रहे जहां पर बेहद खूबसूरत और आकर्षक जापानी स्त्रियां पारंपरिक वेशभूषा जिसे कीमो कहते हैं उसे पहन कर आने वाले मेहमानों का चाय के साथ इस्तक़बाल करतीं हैं।

पूरी दुनियां में चाय पीने और पिलाने के मुख़्तलिफ अंदाज देखे जा सकते हैं,,,, सच देखा जाए तो हिंदुस्तान में चाय पीने की शुरुआत ब्रिटिश पीरियड से हुई थी,,,,, अंग्रेज़ अपने साथ चाय की पत्तियों की तमाम किस्मों के बीज लेकर आए थे और हम हिंदुस्तानियों से ही मुल्क के कई हिस्सों में जहां-जहां चाय की पैदाइश के लिए माकूल माहौल और आबोहवा थी वहीं पर इसकी खेती शुरू करवाई थी,,, और बाकायदा कोलकाता में एक कंपनी खोली गई जिसका नाम ब्रुकब्रांड था।
ब्रुकब्रांड नाम की इस कंपनी की शुरुआत अंग्रेज़ों ने ही की थी शुरू शुरू में छोटे-छोटे गांव कस्बों में इसी कंपनी का चलता फिरता एक चाय का स्टॉल हर जगह लगाया जाता था और हिंदुस्तानियों को इसे मुफ्त में पिलाया जाता था और साथ ही साथ उन्हें माचिस और सुई धागे जैसी कुछ चीजें भी मुफ्त दी जाती थी ताकि उनकी आदत में चाय शुमार हो जाए जिससे वो यहां पर चाय का कारोबार पूरी तरह से फैला सकें,,,,,,
लेकिन हिंदुस्तानियों को इसका कसैला ज़ायका जब पसंद नहीं आया तो बेहद शातिर दिमाग अंग्रेज़ों नें इसमें दूध और चीनी मिलाकर इसे हम हिंदुस्तानियों को पिलाना शुरू कर दिया..... फिर तो इसके ज़ायके का असर आज तक सब के सर पर चढ़कर बोल रहा है.... हालांकि हमारे देश के राजे रजवाड़ों में चाय का चलन बहुत पहले से था लेकिन आम आदमी की पहुंच में ये थोड़ा बाद में आई।
हुजूर ये भी हो सकता है कि चाय में दूध डालने के चलन की शुरुआत हिंदुस्तान से ही शुरू हुई हो जो कि आज तमाम मु़ल़्कों में शुरू हो चुकी है,,,, हम हिंदुस्तानियों नें ही चाय में कई तरह के मसालों को डालकर समय-समय पर तरह-तरह के ज़ायके ईजाद किए हैं ,,,, तुलसी अदरक इलायची लौंग दालचीनी ज़ायफल काली मिर्च और तेज़पत्ते को डालकर जो चाय बनाई जाती है उसे अब हमारे यहां काढ़ा भी कहा जाता है.... हमारे मु़ल़्क के ठंडे हिस्सों में ख़ासकर के सर्दियों में उत्तर भारत के लगभग हर घर में इसी तरह के काढ़े बनाए जाते हैं जिसे आजकल के दौर में अच्छी सेहत की अलामत समझा जाता है।
मेहमान नवाज़ी का ये एक अहम चलन बन चुकी है,,,, अक्सर हमें किसी ना किसी के मुंह से ये जुमला सुनने को मिल जाता है के फलां इतने बेग़ैरत है कि क्या बताएं.... अमां हां किसी को चाय पानी तलक ना पूछा तो क्या पूछा।

साहब चाय की केतली और प्यालियों के हुस्न के भी क्या कहनें पूरी दुनियां में एक से बढ़कर एक नफीस क़िस्म की तमाम बेशकी़मती और खूबसूरत किस्में मौजूद हैं,,,, जिन्हें मेहमान के क़द ओ ओहदे और ख़ास ओ आम होने के लिहाज से उसके सामने पेश किया जाता है,,, मसलन सोने चांदी और बेशकीमती जवाहरात से जुड़ी हुई केतली और प्यालियां किस के सामने रखी जाएंगी और बोन चाइना या फिर पोर्सलीन की किस के सामने रखी जाएंगी.... या फिर कांच और चीनी मिट्टी से बनी हुई किस के सामने पेश की जाएंगी ये पुरानें कायदे आज भी शहर ए ल़ख़नऊ के तमाम बड़े घरानों में देखने को मिल जाया करते है.... यहां तक कि अगर चाय के साथ कुछ नाश्ता वगैरह ना पेश किया गया तो उस चाय को सूखी चाय कहा जाता है.... और तो और मेहमान के हिसाब से ही चाय के साथ किस तरह और क़िस्म का नाश्ता पेश करना है उनके भी ग्रेड पहले से ही तय होते हैं..... तमाम मेंवे जात जैसे चिलगोज़ा काजू पिस्ता बादाम अंजीर से होते हुए तली मूंगफली के नमक में कल्हारे हुए दानों से लेकर मठरी बिस्कुट से होते हुए सूखे रस्क के ठुर्रों तक यह तमाम चीज़े आने वाले मेहमान के रसूख को देखकर तय की जाती है।
फिलहाल हिंदुस्तान के तमाम शहरों में आज भी सुबह का मतलब चाय ही होता है घर की रसोई से लेकर चाय की टपरी तक इस गरमा गरम लौंग इलाइची अदरक की खुशबू से महकती हुई चाय का बोलबाला है,,,अक्सर संसद के गलियारों में भी चाय की प्यालियों में तूफान उठा करते हैं... चाय पर चर्चा और गोष्ठियों आज बड़ी आम सी हो गई है लेकिन चाय का अपना एक मुख़्तलिफ अंदाज़ आज भी क़ायम है।
चाय का कोई व़क्त मुकर्रर नहीं है कभी भी चलते फिरते उठते बैठते कहीं भी चाय पी जा सकती है तो फिर आइए हो जाए एक गरमा गरम चाय की प्याली.... गर्म चाय को केतली में डाल दिया है मेज़ पर कप रख दिए गए हैं बस इंतज़ार है तो सिर्फ.... हुजूर आपका,,, बस चले आइए गली के मोड़ पर दाहिनी ओर जो दीवान साहब की हवेली कहलाती है वो आपकी ही है.....दरवाज़े पर दस्तक देने की ज़रूरत नहीं है वो आपके इंतज़ार में पहले से ही खुला हुआ है।

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