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Saturday, February 10, 2018

पकोड़ा बेचो आज़ाद रहो ,खुश रहो क्यूंकि देश की उन्नति इसी में है |



 https://www.youtube.com/payameamn
पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पकौड़ा‘ बेचने वाले को ‘रोजगारी‘ क्या कहा, पूरे देश में भुचाल आ गया है। सोशल मीडिया हो प्रिंट इलेक्ट्रानिक हो या शहर से लेकर गांव-देहात के चट्टी चौराहे हर जगह पकौड़े पर ही बहस छिड़ी हुई हैं। या यूं कहे मोदी के इस बयान के बाद ‘चाय‘ की तर्ज पर पकौड़े की भी राजनीति में एंट्री हो गई है| 

मैं राजनीतिक आदमी नहीं हूँ इसलिए ऐसी बातों को देश के हित के चश्मे से देखता हूँ | मेरा मानना है की व्यापार छोटा हो या बड़ा आजादी की पहचान है और आने वाली नस्लों के लिए भी आज़ाद रहते हुए तरक्की का जरिया और नौकरी गुलामी की पहचान है और हर नस्ल को नए सिरे ने कुंवां खोदना और पानी पीने जैसा है |






मैं 1981 में मुंबई गया और बैंक में उच्च पद पे नौकरी करने लगा | उन दिनों मुंबई में नया था तो लंच time में बाहर निकल के एक ठेले वाले से डोसा ,इडली इत्यादि खा लिया करता था | वो दोसे वाला अक्सर कहता था साहब आपकी इज्ज़त है की उच्च पद पे हैं और वो भी बैंक में लेकिन अगर आपने दोसे समोसे का ठेला लगाया होता तो आप भी अधिक सुखी होते और आने वाली नस्लें भी सुखी रहती | मैं उसकी बात को हलके में लेता या कभी मजाक समझता था | फिर दूसरी ब्रांच चला गया और भूल गया सब कुछ |

अभी जब ३०साल बाद बैंक से अवकाश प्राप्त किया तो उस समय वापस उसी ब्रांच में आया जहाँ से नौकरी शुरू की थी और एक करोड़ पति अकाउंट होल्डर का कुछ विवाद हुआ किसी चेक के वापस होने पे तो मैं उसके ऑफिस गया जो की एक बड़ा साउथ इंडियन होटल था | वहाँ देखा वही ठेले वाला एक बड़े केबिन में बैठा हुआ है | उसने मुझे पहचान लिया और हाल चाल पुछा और यह भी की अब किस पद पे हैं ?

मैंने बताया की अब रिटायर होने वाला हूँ तो उसने मज़ाक में पूछ लिए क्या बैंक से इतना कमाया की मेरा केवल यह होटल खरीद सको ?

मैं चुप था लेकिन उसका यह सवाल मुझेसे कह गया की ठेले पे जब वो डोसा बेचता था तो उसका मुझे दिया हुआ मशविरा 

"अगर आपने दोसे समोसे का ठेला लगाया होता तो आप भी अधिक सुखी होते और आने वाली नस्लें भी सुखी रहती |"  सही  था |





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