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S.M.MAsoom

Tuesday, August 2, 2011

बुरी तेरी नज़र है और बुर्का पहनू मैं ?

इधर लगातार २-३ लेख मैंने महिलाओं पे हो रहे ज़ुल्म के कारणों का विश्लेषण करते हुए लिखे और हर प्रकार की संभावनाओं पे अपनी बातें आप सभी के सामने रखी. सहमती असहमति के बीच से होता हुआ  कुछ विवादों मैं भी घिरा लेकिन ब्लॉगर का सहयोग मिलता रहा और उनके विचारों और पोल के नतीजे सच्चाई को बयान  करते रहे.

यौन हिंसा किसी महिला या बालिका के खिलाफ किया गया ऐसा यौन व्यवहार है जो उसकी इच्छा के खिलाफ किया गया हो ; इसमें भुक्तभोगी की सहमति नहीं होती है. इन यौन हिंसाओं के खिलाफ आवाज़ अवश्य उठानी चाहिए और इस पे रोक भी लगनी चाहिए. लेकिन इसके लिए यह जानना आवश्यक है की इन यौन हिंसाओं का दोषी कौन है, इसके क्या कारण हैं और इसे कैसे रोका जा सकता है?

यौन हिंसा के बहुत से कारण हैं जिनका मैं ज़िक्र क्र चूका हूँ उसमें से  एक   महिलाओं के उत्तेजक वस्त्रों को भी माना जा रहा है. .  कई जजों और पुलिस अधिकारिओं ने भी इस बात को स्वीकार है लेकिन इस बात को अस्वीकार  करते हुए कल महिलाओं ने टोरंटो, लंदन और सिओल की नकल करते हुए वैसा ही  दिल्ली मैं इंडिया का पहला स्लटवॉक! बेशर्मी मोर्चा निकाला.

सबसे पहला सवाल यह उठता है की यह मोर्चा केवल पुरुषों के ही खिलाफ क्यों? क्या हिंदुस्तान मैं ऐसी महिलाओं, माओं की कमी है जो अपनी बेटियों को उत्तेजक कपडे पहन के जिस्म की नुमाईश करने से रोकती हैं और ऐसे पहनावे को यौन हिंसा का ज़िम्मेदार मानती  हैं?क्या ऐसी युवतीओं की कमी है जो किसी लड़की को मिनी या मिडी मैं देख के यह कहती हैं की लगता है इसके बहुत से बॉय फ्रेंड होंगे?


मुझे तो लगता है की यह प्रदर्शन दर असल हिन्दुस्तानी सभ्यता और संस्कृति को औरतों पे ज़ुल्म का ज़िम्मेदार  मानते हुए उसके  खिलाफ था और मकसद पश्चिमी सभ्यता को हिंदुस्तान मैं लाने की हिमायत करना थी . क्या हमारे हिन्दुस्तान कि सभ्यता महिलाओं पे ज़ुल्म और बलात्कार सिखाती है और पश्चिमी सभ्यता औरतों कि इज्ज़त करना?

पुराने वक़्त मैं बलात्कार और औरतों पे ज़ुल्म बड़ी उम्र के मर्दों कि दबंगई के नतीजे मैं हुआ करते थे जो आज भी देखने को मिलते  है लेकिन आज यह कमसिन नौजवानों मैं भी देखने को मिलने लगा है और इसकी शिकार अक्सर ४-६ वर्ष कि बच्चियां  भी हो जाया करती हैं. यह नौजवान शायद इसी आज़ाद पश्चिमी सभ्यता, पोर्नोग्राफी ,अश्लील फिल्में गाने और उत्तेजक वस्त्रों को देख देख के अपना कण्ट्रोल को दिया करते हैं.

कुदरत ने नर और मादा चाहे वो पेड़ पौधे हों , जानवर हो या इंसान को ऐसा बनाया है की दोनों को एक दुसरे के प्रति आकर्षण देख के ही पैदा होता है. और यही आकर्षण सहमती होने पे सेक्स मैं बदल जाता है. इस आकर्षण को तो ख़त्म करना संभव नहीं और जब किसी स्त्री का शरीर खुला दिखता है तो मर्द का उसे देखना कोई अजीब सी बात नहीं. होना तो यही चाहिए की मर्द औरत पे चाहे वो उत्तेजक कपडे ही क्यों ना पहने हो बार बार नज़रें ना डाले लेकिन महिलाओं को भी उत्तेजक कपडे नहीं पहनने चाहिए इस सच्चाई को कुबूल करते हुए की उनका  का जिस्म मर्द के लिए और मर्द का जिस्म औरत के लिए आकर्षण का कारण हुआ करता है.

फिल्मो के गरमा गर्म गाने में  हिरोइन  या डांसर उत्तेजक कपड़ों मैं पेश ही इसी लिए की जाती हैं की फिल्म को अधिक से अधिक लोग देखें. क्या इस स्त्री पुरुष के आपसी आकर्षण को ख़त्म करना संभव है और यदि ऐसा हो गया तो क्या होगा? 

आज कल समलैंगिक एक तरफ मोर्चे निकालते  हैं और अपनी आज़ादी के नाम पे स्त्री कि जगह पुरुषों से ही काम चला लेते हैं वंही दूसरी तरफ महिलाएं कहती हैं हमें ना देखो. कहीं ऐसा हो गया कि पुरुषों ने महिलाओं कि जगह पुरुषों को ही देखना शुरू कर दिया तो नज़ारा क्या होगा. यकीन जानिए इन महिलाओं मैं से ७५% सजना संवारना बंद कर देंगी. जब किसी को उनका जिस्म देखने लायक लगता ही नहीं तो क्यों खुला रख के बाज़ारों मैं घूमना?

बराबरी के अधिकार के नाम पे वो दिन भी दूर नहीं दिखते जब पत्नियाँ पति  से कहेंगी  मेरा जिस्म तेरे बाप का घर  नहीं की तेरी औलाद को ९ माह गर्भ मैं रखूँ. बच्चों को दूध पिलाना तो धीरे धीरे कम होता जा रहा है क्यों कि इस से उन महिलाओं का फिगर खराब हो जाता है.

महिलाओं के साथ ज़ुल्म केवल सड़कों पे नहीं होते  बल्कि पति के घर पे भी ज़ुल्म हुआ करता है और उसकी मर्ज़ी के खिलाफ सेक्स जिसे बलात्कार कहा जाता है हुआ करता है.  महिलाओं के साथ पतियों द्वारा मार पीट जैसे अपराध भी घरों मैं आम हैं. आज के समाज मैं औरत की शादी हो जाने के बाद वो अपने मैके के लिए भी परायी हो जाती है, तलाक ले ले तो भी अकेले रहना समाज दूभर केर देता है तरह तरह के लांछन लगाये जाते हैं ऐसे मैं मजबूर औरत  घर मैं ही पति से बलात्कार करवाने और मार खाने को मजबूर होती है. इसके लिए कौन मोर्चा निकालेगा और कब? और यदि बेशर्मी मोर्चा निकल भी जाए तो क्या यह इस समस्या का समाधान होगा?

मोर्चे निकलना है तो यौन हिंसा, महिलाओं के साथ हो रहे ज़ुल्म के खिलाफ निकालो ना कि आज़ादी के नाम पे उत्तेजक कपडे पहनने कि मांग को ले कर मोर्चा निकालो. ऐसे बेशर्मी मोर्चे से हिन्दुस्तान की अधिकतर  महिलाएं भी सहमत नहीं आप को यदि यकीन ना हो तो आस पास कि महिलाओं से बातें करें आप को सभी कहेंगी ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का यह तरीका सही नहीं और यह समस्या का हल भी नहीं.

ख़बरों के अनुसार यह बेशर्मी मोर्चा सफल नहीं रहा क्योंकि इसमें ४०० पुलिस वाले २०० मीडिया वाले और १०० आम जनता और भाग लेने वाले शामिल थे.  बीबीसी हिंदी ने अपनी रिपोर्टिंग मैं बताया कि जंतर-मंतर में बेशर्मी मोर्चा प्रदर्शन के ठीक बगल में ही सड़के के किनारे पनवारी लाल और सुमन ने एक छोटा सा झोपड़ा खड़ा किया है, जहाँ पिछले कुछ महीनों से वो अपनी छह साल से गायब बेटी लक्ष्मी को ढूँढ़ने के लिए प्रशासन के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.
उनके पास ना ही मीडिया का साथ है, ना ही प्रदर्शनकारियों की फ़ौज. बस बेटी की छोटी सी तस्वीर बाहर टाँग रखी है
सवाल उठता है कि इस यह गरीब की बेटी लक्ष्मीको तलाशने के लिए कौन सी महिलाएं मोर्चा निकालेंगी  और कब?

बलात्कारी को सख्त से सख्त सजा कि मांग करना सही, महिलाओं की  इज्ज़त की जानी चाहिए यह भी सही है लेकिन “मेरी छोटी स्कर्ट का तुमसे कोई लेना-देना नहीं है.” “सोच बदलो, कपड़े नहीं.” या बुरी तेरी नज़र है और बुर्का पहनू मैं ? जैसी बातों का कोई मतलब समझ मैं नहीं आता. या तो यह तै कर लिया जाए कि मेरा शरीर है मैं जो चाहूँ पहनू और तुम्हारी आँख है तुम जो चाहो देखो.यही काम तो जंगली जानवर भी किया करते हैं.

यह सच है कि महिलाएं यदि उत्तेजक कपडे भी पहनती हैं तो भी पुरुषों को उनको बेईज्ज़त करने का, उनपे भद्दे कमेन्ट करने का या बलात्कार का लाइसेंस नहीं मिल जाता इस्लाम मैं भी पर नारी परदे मैं हो या बेपर्दा पहली नज़र के बाद दूसरी नज़र डालना पाप कहा जाता है लेकिन महिलाओं को भी उत्तेजक कपडे पहन कर पुरुषों को आकर्षित करने से बचना चाहिए. क्यों की ताली दो हाथों से ही बजती हैं.

वैसे भी उत्तेजक कपड़ों के बावजूद ९९.९% पुरुष नज़र से चाहें देख लें बलात्कारी नहीं होते. अपराध रोकने के लिए अपराधी को सजा के साथ साथ उसके कारणों को भी ख़त्म करना होता है. चोरी रोकनी हैं तो चोरों को सजा दो लेकिन साथ साथ पहरेदार बिठाओ और घरों मैं ताले भी लगाओ.


भारतीय सभ्यता और संस्कृति यौन हिंसा का पाठ नहीं पठाती बल्कि महिलाओं कि इज्ज़त करना सिखाती है यह हम है जो दूसरों कि सभ्यता जहां ना माँ कि इज्ज़त है ना बहन ,जहां स्त्री के जिस्म का इस्तेमाल व्यापार और ताल्लुकात बढ़ाने के लिए किया जाता है उसे अपनाने की हिमायत करने लगे है.
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