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Wednesday, February 22, 2017

जब औरत घर की जिम्मेदारियां ना संभालना चाहे तो क्या करें?

peopleइंसान को जीने के लिए इस दुनिया मैं बहुत कुछ करना पड़ता है. बचपन से बच्चों को पढाया लिखाया जाता केवल इसलिए है कि समाज मैं इज्ज़त से सर उठा के जी सकें. अपनी अपनी सलाहियत के अनुसार हर इंसान अपने रोज़गार का रास्ता चुन लेता है. कोई व्यापार करने लगता है, कोई विज्ञान मैं महारत हासिल करता है तो कोई बैंकिंग मैं और उसी के अनुसार नौकरी कर लेता है. इस प्रकार इंसान का जीवन दो ख़ास हिस्सों मैं बंट जाता है . पहला उसका घर और परिवार और दूसरा उसकी नौकरी या व्यापार |

किसी के पास अच्छा व्यापार या नौकरी है और उसका घर भी अच्छे से चल रहा है तो वो इंसान एक सुखी इंसान कहलाता है | लेकिन इन दोनों सुखों को पाने के लिए इन्सान को बहुत सी कुर्बानियां  देती पड़ती हैं, मेहनत करनी पड़ती है. इसमें औरत या मर्द का कोई सवाल नहीं आता बल्कि जैसा कि मैंने कहा अपनी अपनी सलाहियतो का इस्तेमाल करते हुए करते हुए  औरत और मर्द इन  सुखों को पाने कि कोशिश करते हैं|

यकीनन यदि किसी घर मैं पति और पत्नी दोनों घर पे बैठ के रोटियां  पकाएं , बच्चों की परवरिश मैं ही लगे रहें तो उनको यह सब करने के लिए धन कहाँ से आएगा? और यदि दोनों नौकरी करने लगें तो घर का सुकून ख़त्म हो जाता है क्यों कि केवल धन से ना तो औलाद  की  सही परवरिश संभव है और ना ही शाम के २ घंटो मैं घर को संभालना संभव है|

सबसे बेहतर तरीके से वही घर चलता है जहाँ एक धन कमाने के लिए घर से बाहर जाए और दूसरा घर पे रहते  हुए औलाद की परवरिश और घर तथा समाज के दूसरे कामों को अंजाम दे|  कौन किस काम को करेगा इसका फैसला उनकी सलाहियत करेगी ना कि हमारी जिद |

यह औरत ही है जो अपने गर्भ मैं ९ महीने अपने बच्चे को रखती है और जन्म होने पे उस बच्चे को दूध पिलाना होता है| ऐसे मैं बच्चा अपनी माँ से लगा रहता है और वो जैसी  परवरिश करती है वैसा बनता चला जाता है. यह दोनों काम किसी मर्द के लिए करना संभव नहीं यह सभी जानते हैं.ऐसे मैं इस बात कि जिद करना कि हम घर को नहीं संभालेंगे ,बस बाहर जा के धन कमायेंगे कहाँ तक उचित है?

मर्द को ना गर्भ मैं बच्चे रखने हैं, ना दूध पिलाना है|  मर्द शारीरिक रूप से भी अधिक मज़बूत है तो यदि वो बाहर के काम करे, मजदूरी करे, नौकरी करे ,व्यापार करे तो इसे  ना इंसाफी तो नहीं कहा जा सकता? यहाँ ना तो किसी गुलामी की बात है और ना ही किसी ज़ुल्म कि बात है. यह बात   है पति और पत्नी के समझोते की जिसके नतीजे मैं दोनों पारिवारिक सुख का अनुभव करते हुई सुखी जीवन व्यतीत करते हैं |

यदि किसी अलग परिस्थिति में या मजबूरी में यह आवश्यक हो जाए कि पत्नी नौकरी करे या ऐसी औरत जिसके  कोई औलाद नहीं, घर पे पड़े पड़े क्या करे तो यकीनन उसे भी अपने  व्यापार मैं साथ देना चाहिए और नौकरी कर के कुछ और धन कमाने कि कोशिश करनी चाहिए |लेकिन पति कमाने में सक्षम है, व्यापार भी बढ़िया है फिर भी अपने औलाद के प्रति , घर के प्रति ज़िम्मेदारी को महसूस ना करते हुए  बाहर नौकरी करने कि जिद ,या किसी और काम मैं समय गंवाने की जिद क्या घर का सुकून और चैन ख़त्म नहीं कर देगी?

माना कि घर कि जिम्मेदारियों   को निभाना आसान नहीं, घर मैं बंध के रह जाना  पड़ता है , अक्सर बुज़ुर्ग महिलाएं घर की बहु को ना जाने क्या क्या सुना देती हैं, बहुत बार खराब पति होने पे पति की चार बातें घर  की सभी ज़िमेदारियां निभाने   के बाद भी  सुननी भी पड़ती है लेकिन यह हर घर मैं तो  नहीं होता?

क्या नौकरी मैं मर्द को ज़िल्लत का सामना नहीं करना पड़ता? क्या खराब अफसर के आ जाने पे बुरा भला नहीं सुनना पड़ता? यह तो जीवन है जिसमें इस तरह कि बातें होती रहती रहती हैं. इसका बहाना बना के यदि मर्द नौकरी की  ग़ुलामी से भागने लगे और औरत घर मैं रहके अपनी जिमेदारियों को निभाने को ग़ुलामी का नाम देते हुए उससे से भागने लगे तो यकीन जानिए मानसिक शांति जिसके लिए हम सब कुछ करते हैं ख़त्म हो जाएगी|  आज  तरक्की के युग में ऐसे घरों की संख्या दिन बा दिन बढती जा रही है जहां अब मर्द घरों पे बैठते हैं और पत्नी नौकरी किया करती है |

ध्यान रहे अकारण जिद घरों को बसाते नहीं उजाड़ देते  हैं. कुछ लोग तो इतने अव्यवहारिक अपनी  जिद मैं हो जाते हैं कि तरक्की के नाम पे महिलाओं को शादी ना करने तक का मशविरा दे डालते हैं|

पति और पत्नी को अपनी जिद छोड़ के अपनी अपनी सलाहियतो, परिस्थियों के अनुसार काम को बाँट लेना चाहिए और सुख से जीवन व्यतीत करना चाहिए. यही वास्तविक तरक्की कहलाती है|
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61 टिप्पणियाँ:

  1. पति और पत्नी को अपनी जिद छोड़ के अपनी अपनी सलाहियतो, परिस्थियों के अनुसार काम को बाँट लेना चाहिए और सुख से जीवन व्यतीत करना चाहिए. यही वास्तविक तरक्की कहलाती है.
    --
    बहुत प्रेरक और शिक्षाप्रद आलेख!

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  2. ध्यान रहे अकारण जिद घरों को बसाते नहीं उजाड़ देते हैं.

    सटीक बात कही है आपने .....जीवन में अगर हम अपने कर्तव्यों को नहीं निभा पाते तो फिर जीवन क्या जीयेंगे ....बहुत विचारणीय प्रश्न है यह ...आपका आभार

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  3. आज के बदले हुए परिवेश में पति पत्नी दोनों का काम पर जाना एक आवश्यकता सी बन गई है । लेकिन घर को भी दोनों को मिल कर संभालना पड़ता है । काम को बाँट लेने में कोई बुराई नहीं । आपसी समझ बूझ की ज़रुरत अवश्य रहती है ।

    मासूम भाई आपने अभी तक मैं को में ( me) नहीं लिखा ।

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  4. यह सच है कि प्रकृति की ओर से महिलाओं में दया और सेवा भावना की प्रचुरता है .. इसका अर्थ यह नहीं कि प्रतिभाशाली महिलाएं भी सिर्फ परिवार की सेवा करते हुए अपनी जिंदगी गुजार दें .. यह सच है कि शारीरिक तौर पर महिलाओं को बालक को गर्भ में नौ महीने रखने और स्‍तनपान कराने की विशेषता प्राप्‍त है .. प्रकृति के विरूद्ध कोई महिला काम नहीं कर सकती .. पर प्रकृति यह भी नहीं चाहती कि महिलाएं सिर्फ इसी कार्य को करती रहें .. यदि ऐसा होता तो प्रकृति महिलाओं के मस्तिष्‍क की बनावट बिल्‍कुल भिन्‍न रखती .. अध्‍ययन के क्षेत्र में महिलाएं पुरूषों के समक्ष टिकती ही नहीं .. पर आज महिलाओं ने मौका मिलते ही साबित कर दिया कि किसी भी क्षेत्र में वे पुरूषों से कम नहीं है .. आज की 90 प्रतिशत प्रोफेशनल घर परिवार बच्‍चे संभालते हुए हर क्षेत्र में आगे बढ रही है .. वो बस इतनी उम्‍मीद रखती है कि पहले के पतियों जितनी अपेक्षा न रखें .. मिल बांटकर घर परिवार के कार्यों या जबाबदेहियों को संभाले .. इसमें कोई बुराई नहीं !!

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  5. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 12-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. काम का विभाजन केवल और केवल लिंग आधारित नहीं हो सकता हैं
    स्त्री बच्चे को जनम देती हैं लेकिन ये जरुरी नहीं हैं की हर स्त्री देना चाहे
    स्त्री का विवाह उसकी नियति नहीं हैं
    जैसे पुरुष को अधिकार हैं अपने लिये कैरियर चुनने का स्त्री को भी संविधान और कानून देता हैं
    सवाल हैं क्या स्त्री को ये समाज अधिकार देता हैं की वो कानून और संविधान की दी हुई बराबरी के तहत अपने लिये चुनाव कर सके की उसको काम करना हैं या नहीं , शादी करनी हैं या नहीं , बच्चे पैदा करने है या नहीं , घर में रहना हैं या बाहर जाना हैं
    मै ऐसी बहुत से स्त्रियों को जानती हूँ जो अपने भाई बहनों को पढ़ाने के लिए नर्स , टाइपिस्ट और बहुत सी ऐसी नौकरियां करती हैं जहां यौन शोषण की संभावनाए असीमित हैं क्युकी जिन पुरुषो के नीचे वो काम करती हैं वो जानते हैं की ये मजबूर हैं नौकरी नहीं छोड़ सकती . इन स्त्रियों को क़ोई क्यूँ नहीं नौकरी करने से रोकता , क्यूँ इनकी नौकरी करने को एक सैक्रिफैस का नाम दिया जाता हैं . गलती उनके माँ बाप की हैं जो जब शादी के लायक ही नहीं थे उनकी शादी की गयी और फिर उन्होने बच्चो की लाइन लगा दी और उसका भुगतान उनकी बेटियाँ उठाती हैं
    ये लडकियां नौकरी नहीं करना चाहती , विवाह करना चाहती हैं , लोग बजाये उनका शोषण करने के उनसे विवाह ही क्यूँ नहीं कर लेते .

    क्या जरुरी हैं की जो लड़की नौकरी करना चाहती हैं उसको विवाह के लिये बाधित किया जाये . यहीं समस्या की जड़ हैं , हम लकीर पीटना चाहते हैं की शादी करना जरुरी हैं जबकि सोचना ये चाहिये की शादी उनकी हो जो करना चाहे नाकि इस लिये हो की लड़कियों को घर में रह कर गृहस्ती संभालनी चाहिये

    जिन लड़कियों को शादी की जरुरत हैं , जिनको ऐसे परिवार और पति चाहिये जो उन के मायके के सम्बन्धियों को पढ़ा लिखा सके ऐसी लड़कियों को पति और शादी क्यूँ नसीब नहीं होती इस पर विचार दे . क्यूँ लोग केवल उन लड़कियों से शादी करना चाहते हैं जो पढ़ी लिखी हैं , दहेज़ भी ला सकती हैं , वक्त जरुरत नौकरी भी कर सकती हैं और बच्चे भी समभाल सकती हैं

    हजारो गरीब मजदूरों की लडकिया हैं जिनकी शादी नहीं होती क्यूँ , क्यूँ नहीं वो पुरुष जिन्हे महज एक पत्नी चाहिये आगे आकर इनका हाथ पकड़ते हैं

    जो करना नहीं चाहता उसकी जबरदस्ती करना और जो चाहता हैं नहीं करना

    पोस्ट अधूरी है और एक तरफ झुकी हैं , समाज के रीति रिवाज की तरफ
    चुनने के अधिकार का क़ोई जिक्र नहीं हैं

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  7. sangita puri ji

    is behtareen kament kae liyae taliyaan

    kyaa baat haen

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  8. This comment has been removed by the author.

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  9. रचना जी आप महान हैं. आपने कहा स्त्री बच्चे को जनम देती हैं लेकिन ये जरुरी नहीं हैं की हर स्त्री देना चाहे.
    .

    भाई क्या दुनिया का अंत करवा के छोडेंगी? :)
    .
    संगीता जी आप ने सही कहा की "मिल बांटकर घर परिवार के कार्यों या जबाबदेहियों को संभाले .. इसमें कोई बुराई नहीं !!"

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  10. हा हा हा डॉ दाराल जी इस लेख मैं बहुत से में थे उनको ठीक करते करती लगता है कोई बड़ा "मैं " रह गया. कोशिश की है धीरे धीरे यह मैं भी ग़ायब हो जाएगा. :)

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  11. masum ji aap ne to tik hi kaha magar har kisi ke kar pe hamesa ego rahatha hai, samje to tik hai nahi to
    toooooo.......
    aap ne sahi farmaya hai
    lakin yasa nahi hotha hai

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  12. वैसे प्राकृतिक बात तो ये है कि पुरुष को सिर्फ सांड की तरह होना चाहिए चाहे जहाँ मुहँ मारे कोई जिम्मेदारी नहीं या फिर बैल की तरह होना चाहिए बधिया जिन्दगी भर चारे के लिए बोझा ढोता हुआ।

    स्त्रियाँ संतान को नौ माह अपने शरीर में संरक्षण देती हैं अपने रक्त से सींचती हैं। पुरुष का तो संतान से रक्त का संबंध तक नहीं होता, केवल वीर्य का होता है जो उत्तेजना में कभी भी निकल पड़ता है।

    स्त्रियाँ संतान को जन्म देती हैं तो उसे अपने ही श्रम से पाल पोस कर बड़ा भी कर सकती हैं, योग्य भी बना सकती हैं और बनाती भी हैं। उन्हें इस के लिए पुरुष की कोई आवश्यकता नहीं है। वह तो पुरुष ही है जो स्त्रियों को यह सब न करने देने की बाध्यताएँ खड़ी कर के उन्हें कमजोर बनाता है जिस से स्त्री उस के अधीन बनी रहे। क्या इस पोस्ट की भावना भी यही नहीं है?

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  13. मासूम जी आप बात को सही तरह से समझे , मैने उन स्त्रियों की भी बात की हैं जो शादी करना चाहती हैं और बच्चे भी चाहती हैं क्या उनके शादी करने से दुनिया नहीं चलेगी जिम्मेदारी देने से पहले क्या ये जानना जरुरी नहीं हैं की जिस पर ज़िम्मेदारी डाली जानी हैं उसकी मर्ज़ी क्या हैं . उसकी जरुरत क्या हैं .

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  14. जब औरत घर की जिम्मेदारियां ना संभालना चाहे तो क्या करें? घर उजड जायेगा, बच्चे आवारा बने गे...
    जब मर्द घर की जिम्मेदारियां ना संभालना चाहे तो क्या करें? तो सयानी स्त्री फ़िर भी घर को समभांल लेगी, मेहनत मजदुरी कर के बच्चो को इज्जत की जिन्दगी दिला देगी..... समाज मे घर के बच्चो को मान सम्मान दिला देगी, मैने ऎसे बहुत से केस देखे हे, जब पति निक्कम्मा हो तो स्त्री घर को स्वर्ग बना देती हे, लेकिन जब स्त्री निक्म्मी हो तो घर नर्क बन जाता हे.

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  15. बहुत बढ़िया विषय चुना है आपने मासूम जी!...आप के विचारों से सहमत होते हुए भी कहना चाहूंगी कि जीवन में कोई खास मुकाम हासिल करने की अभिलाषा रखने वाली स्त्रियों को चाहिए कि शादी करने से पहले अच्छी तरह सोच ले कि जीवन में प्राथमिकता किसे देनी है...घर गृहस्थी को या अपने करियर को!..यह तय करने के बाद शादी करने पर कोई बड़ी समस्या का सामना नहीं करना पडेगा!...पुरुष को भी चाहिए कि पत्नी की मानसिकता को समझ कर ही कोई निर्णय ले!...धन्यवाद!

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  16. जीवन एक अमूल्य उपहार है,जहाँ पुरुष और स्त्री एक दुसरे के पूरक है,वही घर की समस्याये भी उनकी अपनी होती है,इस चक्कर मेँ बच्चोँ के मानसिक स्थितियोँ सेँ खिलवाड् नहिँ होना चाहिये।चाहे स्त्री घर के अन्दर काम करे या बाहर।

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  17. sangeeta puri ji ne sahi kaha hai unse sahamat.

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  18. आपसी सामन्जस्य और एक दूसरे की भावनाओं का संपूर्ण सम्मान ही सुखद वैवाहिक जीवन का सूत्र है.

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  19. parivar banane se pahale usase jude daayitvon ko thande dimag se soch lena chahie , aap apane kairiyar ko prathmikata den to parivar ke bandhan se mukt hi rahen aur agar parivar banayen to donon ko hi karyon men samanjasya sthapit karke use chalane ke prati purn imandar rahen. apasi sahyog se sab sambhav hai. ego jaisi cheej ek sukhmay parivarik vatavaran nahin de sakata hai.

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  20. घर परिवार को शुरु करने से पहले अगर दोनों स्वतंत्र रूप से गृहस्थ-जीवन के लिए तैयार हों तो आने वाली कई समस्याओं का समाधान भी मिल जाता है..एक दूसरे के वजूद का..इच्छाओं का आदर घर परिवार में सुख शांति ही नहीं समृद्धि भी लाता है.

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  21. औरत की महानता ही यही है की औलाद की परवरिश उस समय भी करती है जब बाप उनका ख्याल नहीं करता. अब इसी माँ को घर की जिम्मेदारियों से दूर रख के नौकरियों पे भेजने की तैयारीयां की जा रही हैं. राज जी आप की टिप्पणी हमेशा ही व्यावहारिक हुआ करती है.

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  22. काम का विभाजन केवल और केवल लिंग आधारित नहीं हो सकता हैं
    स्त्री बच्चे को जनम देती हैं लेकिन ये जरुरी नहीं हैं की हर स्त्री देना चाहे
    स्त्री का विवाह उसकी नियति नहीं हैं
    ???

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  23. Ismein pehla takrav to yeh hai ki Mard samajhtein hain ki Ghar sambhalna bahut hi asaan aur mahatvheen kary hai... Aur jo kary vah karte hain vah bahut hi mahatvpurn hai... Samasya yahin se utpann hoti hai... Jab chhote kaam ko bada aur bade ko tuchh samjha jaata hai...

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  24. शाहनवाज़ भाई दूसरों का काम सभी को आसान और खुद का सख्त लगता है. यही बात यहाँ भी लागु होती है लेकिन यहाँ मसला यह है कि मर्द और औरत मैं से कौन किस काम को करेगा? मेरा मानना यह है कि अपनी अपनी सलाहियत के अनुसार घर या बाहर का काम बंट लो. अब क्या यह बताने कि आवश्यकता है कि किस मैं क्या सलाहियत अधिक है?

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  25. इस बात से सहमत हूँ मैं भी कि ".औरत को खुद अपनी प्राथमिकता निर्धारित करनी होगी"
    .
    अगर वो औरत होगी तो प्राथमिकता अपने ओलाद की बेहतर परवरिश को ही देगी वरना .........

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  26. घर किसे संभालना है , किसे बाहर की जिम्मेदारी संभालनी है , प्रत्येक दंपत्ति का आपसी अनुबंध होना चाहिए, इसमें दूसरों का हस्तक्षेप ठीक नहीं .
    दोनों ही पक्षों को जिद की बजाय सामंजस्य की पहल करनी चाहिए !

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  27. अगर वो औरत होगी तो प्राथमिकता अपने ओलाद की बेहतर परवरिश को ही देगी वरना .........


    लीजिये आप की मंशा खुद ही सामने आगयी
    अगर वो औरत होगी ?? इस प्रकार की बात लिखने से पहले सोच लेते की पूरी पोस्ट की तहस नहस आप ने खुद ही कर दी
    भारतीये कानून और संविधान अब ऐसे बन रहे हैं की ये सब बाते खुद ही बेमानी हो जाती हैं फिर भी आप लिखते रहेगे क्युकी जैसा दिनेश जी ने कहा हैं की ये सब परपंच पुरुष / समाज के रचित हैं ताकि औरत को दबा कर रखा जा सके
    लोग तो कहते हैं हर औरत माँ बने या ना बने ये उसकी मर्ज़ी हैं पर हर औरत में माँ होती ही हैं और आप "अगर वो औरत होगी " जैसी बात कह कर हर औरत का अपमान कर रहे हैं

    व्याख्या दे दे औरत क्या होती हैं अगली पोस्ट में , उसके कर्त्तव्य भी निश्चित कर दे ताकि एक बार में लोगो को पता चल जाये की किस मानसिकता के तहत आप ये सब आलेख लिखते हैं और फिर कुछ ब्लॉग के "पुरुष " यहाँ आकर वाह क्या लिखा हैं लिखते रहेगे

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  28. रचना जी आप की नकारात्मत सोंच और लेख को पढ़े बिना जवाब देना आप की टिप्पणिओं की अहमियत को कम कर जाता है. औरत उसे कहते हैं जिसके सामने यदि औलाद की परवरिश और उस का भविष्य आ जाए तो वो दुनिया के अपने हर शौक़ , हर ख्वाहिश का त्याग कर के अपनी औलाद की फ़िक्र पहले करती है. क्यों की औरत नाम मैं ममता का, त्याग का. उसी कोई त्याग करने को कहे या ना कहे वो करती है.
    .
    औरत नाम ज़ुल्म सहने का नहीं है और ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाना आवश्यक होता है. लेकिन यह भी ज़ुल्म है की औलाद अपनी बेबी सिटिंग मैं बर्बाद हो रही हैं और उनकी माँ चंद पैसों के लिए और आज़ादी , तरक्की के नाम पे किसी कम्पनी मैं गुलामी कर रही हैं.
    .

    इंसान गुलामी शौक से नहीं मजबूरी से करता है. और मैं पहले भी ख चुका हूँ ध्यान रहे अकारण जिद घरों को बसाते नहीं उजाड़ देते हैं.
    .
    आपनी पहली टिप्पणी मैं कहा गया था यह पोस्ट अधूरी है. मैडम यह एक लेख है कोई दीवान नहीं लिखा मैंने. महिलाओं पे मेरी पहले की पोस्ट तलाशें उसमें आप के सवालों का बाकी जवाब भी हैं . हाँ आप पढना ना चाहें और भूल जाना चाहें तो इसका कोई इलाज नहीं.

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  29. इश्क़ की एक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम
    इस ज़मीनो आसमाँ को बेकराँ समझा था मैं

    जो उर्दू नहीं जानते उनके लिए :-
    जस्त यानि छलाँग , बेकराँ यानि अनंत

    यह शेर बताता है कि जिन चीज़ों की इंतेहा समझना अक़्ल के बस से बाहर है , अपने रब से इश्क़ की बदौलत इंसान उनसे भी आगे देख सकता है ।
    ज़मीनो आसमान की हक़ीक़त समझने से ज़्यादा मुश्किल है रिश्तों का हक़ और उनकी हक़ीक़त समझना ।
    नादान हैं वे जो मानते हैं कि बीस पचास लोगों की समिति इस बात को 2-3 साल में सही तौर पर समझ लेगी ।
    संविधान औरत की परिभाषा क्या देता है ?

    यह जानना ज़रूरी है ,
    बताइये संविधान की दुहाई देने वालों में कौन बताएगा ?
    अगर परिभाषा ही तसल्लीबख़्श न हुई तो आगे क्या होगा ?

    नारी को नर की भाँति कमाकर लाने पर मजबूर कर दिया जाए और तब उसे चार इल्ज़ाम के साथ एक सम्मान दिया जाए तो यह सम्मान उसके नारीत्व को कब मिला ?

    क्या दुनिया में कोई ऐसी व्यवस्था है जो नारी को उसकी स्वाभाविक ज़िम्मेदारियों से दूर हटाए बिना उसे आर्थिक रूप से सशक्त बना सकती है ?

    एक ऐसी व्यवस्था जो नारी के नारीत्व को सम्मान देना सिखाए , जो नारी को घर के साथ बाहर भी काम का पूरा अधिकार तो दे लेकिन बाहर जाकर धन लाना उसके अस्तित्व की सुरक्षा से जुड़कर उसकी अनिवार्य मजबूरी न बनाती हो ?

    ReplyDelete
  30. मासूम भाई... बात घर के या बाहर के काम की नहीं है... बात यह है कि कोई महिला अगर घर पर रहकर बच्चो की परवरिश करे तो उसके मूल्यांकन कोई पैमाना ही नहीं है... मर्द को वेतन मिलता है, इसलिए उसके कार्य का मूल्यांकन तो वेतन से हो जाता है.... मेरे विचार से हीन भावना यहीं से शुरू हुई... क्योंकि यह 100 प्रतिशत सच कि अक्सर मर्द सोचते हैं कि गृह कार्य भी कोई काम है... दिन भर घर पर बैठ कर आराम करते रहो... लेकिन अगर वही काम करना पड़ जाए तो नानी याद आ जाती है...

    "अगर वो औरत होगी तो प्राथमिकता अपने ओलाद की बेहतर परवरिश को ही देगी वरना..."

    आपकी इस बात से मैं इत्तेफाक नहीं रखता हूँ... हालाँकि घर का प्रबंधन करना तथा बच्चों की अच्छी परवरिश करना एक बेहद ज़रूरी कार्य है... फिर भी अगर कोई ना करना चाहे तो जोर-ज़बरदस्ती भी नहीं होनी चाहिए... इसमें किसी की अनिवार्यता की जगह पति-पत्नी को मिलकर निर्णय करना चाहिए कि कौन क्या काम संभालेगा...

    घर तभी चल सकता है जबकि एक घर का बॉस हो तथा दूसरा बहार का बॉस हो... घर के बॉस का घर के लिए अंतिम निर्णय होना चाहिए हालाँकि दूसरे जीवन साथी से सलाह-मशविरा लेना चाहिए... वहीँ घर से बहार के बॉस का बाहर के लिए अंतिम निर्णय होना चाहिए... हालाँकि यहाँ भी बाहर के कार्य के लिए दूसरे जीवन साथी से सलाह-मशविरा लेना चाहिए... लेकिन अगर किसी घर में घर और बाहर के कार्य के लिए बॉस निर्धारित नहीं हैं तो घर चल ही नहीं सकता है... बल्कि घर शांति की जगह कलह की जगह बन जाएगा.... किसी भी क्षेत्र में दो-दो बॉस होने से क्या स्थिति होगी, वही नियम यहाँ भी लागू होता है.

    हालाँकि मैं आपके इस आशय से भी सहमत हूँ कि महिलाओं को कैरियर के साथ-साथ अथवा उससे भी ज्यादा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि बच्चो की देखभाल, परवरिश ठीक ढंग से हो सके... क्योंकि इस मामले में तो मर्द निकम्मे हैं... और शायद चाह कर भी ममता अपने अन्दर नहीं समेट सकते हैं, क्योंकि यह नेसर्गिक प्रतिभा तो कुदरत ने महिलाओं को ही दी है....

    साथ ही साथ यह भी ज़रूरी नहीं कि महिलाऐं गृह कार्य ही करें... कई जगह तो ऐसी हैं जहाँ महिलाओं का होना बहुत ज्यादा आवश्यक है... और फिर मर्दों की तरह महिलाओं को भी अपनी योग्यताओं को साबित करने का हक है... हाँ यह अवश्य है कि बच्चो की परवरिश जैसे महत्वपूर्ण कार्य को यूँ बेबी सिटर जैसे पर छोड़ने से समाज का ह्रास हो रहा है... इसलिए इस और बहुत अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है...

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  31. A nice post. There may be some exceptional cases but in general your views are really practically perfect.

    REgards
    Zafar

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  32. मेरी सोच नकारात्मक हैं , क़ोई बात नहीं वही बात संगीता पूरी , दिनेश दूवेदी , पी डी , डॉ अरुणा , मीनाक्षी , पी डी ने भी कहीं हैं
    अब इतने सारे नकारात्मक लोग मिल कल सकारात्मक समाज बना ही लगे क्युकी २ नेगेटिव मिल कर एक पोसिटिव बन जाते हैं

    किसी को पसंद हो ना हो मेरा कमेन्ट तो हर उस पोस्ट पर होगा जहां नारी सश्क्तिकर्ण को नकारात्मक माना जाता हो कमेन्ट डिलीट करना आप का अधिकार कभी उज्र नहीं होगा

    ReplyDelete
  33. मुंडे मुंडे मति भिन्ना
    आपत्तिकाल के समय बने नियम सार्वकालिक नही हो सकते. घर की देखभाल करने का मतलब गुलामी नही होता.ना ही नौकरी करने वाला /वाली स्वतंत्र. ना ही घरफोरनी औरतो की आवाज हो सकती है. यहा बहस मे शामिल सभी लोग आत्म चिंतन करे कि वे कितने स्वतंत्र है.

    ReplyDelete
  34. मासूम भाई ,

    सच है ,
    यदि मर्द नौकरी की ग़ुलामी , अथवा अर्थोपार्जन के अन्य साधन-कर्मों से भागने लगे और औरत घर मैं रहके अपनी जिमेदारियों को निभाने को ग़ुलामी का नाम देते हुए उस से से भागने लगे तो यक़ीनन मानसिक शांति जिसके लिए हम सब कुछ करते हैं ख़त्म हो जाएगी ।

    पोस्ट उपयोगी ही लगी …
    आदरणीया रचना जी की शंकाओं और सवालों का उत्तर राज भाटिया जी , अरुणा कपूर जी , वाणी जी , मीनाक्षी जी , दराल जी , समीर जी की प्रतिक्रियाओं के साथ ही आदरणीया संगीता जी के कमेंट में भी है …

    परिवार और गृहस्थी बहुत पवित्र उद्देश्यों की पूर्ति का विधान है ! यहां स्वार्थ , वैमनस्य अथवा षड़यंत्र को कोई स्थान नहीं । इसमें प्रविष्ट होने से पूर्व ही मन में समर्पण भाव का संकल्प लेना आवश्यक है । … और यह मात्र स्त्री नहीं पुरुष के लिए भी समान रूप से आवश्यक है ।

    आलेखों में पारदर्शिता और अधिक हो तो और अच्छा हो ! :)

    बधाई और शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  35. डा. अरुणा कपूर.जी आप ने मेरे लेख के सही पैग़ाम को समझा शायद इसी लिए सहमत भी हैं.आप का मशविरा १००% सही हैं की स्त्रियों को चाहिए कि शादी करने से पहले अच्छी तरह सोच ले कि जीवन में प्राथमिकता किसे देनी है...घर गृहस्थी को या अपने करियर को!.

    मेरा यह लेख ग्रहस्त जीवन मैं जाने के बाद स्त्री और पुरुष कैसे सुखी जीवन बिताएं उनके लिए है. यदि कोई शादी ना करे अपने करियर को बनाने के लिए तो यह उसका जाती फैसला है जो मेरी नज़र मैं व्यावहारिक नहीं है.
    .
    आभार

    ReplyDelete
  36. संगीता पुरी जी आप कि इस बात से सहमत हूं कि " मिल बांटकर घर परिवार के कार्यों या जबाब देहियों को संभाले"
    .
    मेरे लेख मैं इसीलिये यह कहा गया है कि " किसको क्या काम करना है सुखी जीवन व्यतीत करते के लिए इसका फैसला उनकी सलाहियतो, परिस्थियों के अनुसार किया जाना चाहिए ना कि आज़ादी के नाम पे अकारण जिद कि बिना पे".

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  37. रचना जी आप महान है आप कुछ भी कह सकती हैं. आप कि असहमति भी मेरा ज्ञान बढ़ती है. यहाँ कौन किस से सहमत है यह मुझे बताने कि आवश्यकता नहीं क्यों कि सभी पढना जानते हैं लेकिन आप के एक सहयोगी मुझे याद हैं जो बड़ा सा हैट लगा के सीधे अफ्रीका से आने का दावा कर रहे थे और बता रहे थे कि वहाँ पे स्त्रीयां कपडे बहुत कम पहनती हैं फिर भी बलात्कार नहीं होता. और जब मैंने आंकड़े पेश किये कि बलात्कार कि दर देखी जाए तो साऊथ अफ्रीका पहले स्थान पे है तो जनाब ऐसे ग़ायब हुए कि बस पूछिए मत.
    मशविरा यही दूंगा कि झूठे और गुमराह करने वाले ऐसे साथियों से दूर ही रहे.

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  38. यह तो जीवन है जिसमें इस तरह कि बातें होती रहती रहती हैं. इसका बहाना बना के यदि मर्द नौकरी की ग़ुलामी से भागने लगे और औरत घर मैं रहके अपनी जिमेदारियों को निभाने को ग़ुलामी का नाम देते हुए उस से से भागने लगे तो यकीन जानिए मानसिक शांति जिसके लिए हम सब कुछ करते हैं ख़त्म हो जाएगी. आज तरक्की के युग में ऐसे घरों की संख्या दिन बा दिन बढती जा रही है.

    मासूम साहब , आपका ये लेख मुझे बहुत अच्छा लगा , आजकल के समय में समाज में यही स्थिति हर दुसरे घर बनती जा रही है .,
    कोई भी अपनी जिम्मेदारी मानने को तैयार नहीं है ....केवल उसे अपना दिखाई देता है .....और स्थिति तब तो और भी भयावह हो जाती है जब घर की औरत ही अपनी जिम्मेदारियों से मुह मोड़ने लगे..........क्योकि वो इक बसे बसाये घेर को तोड़ने की कोशीस करने लगती है,
    हो सकता है मेरी ये बात कुछ लोगो को बुरी लगे .पर मै उसकी परवाह नहीं करता .........मै समाज में ऐसे बहुत से केस जनता हूँ जहाँ आदमी अपने घेर से अलग तो हो गया पर वो घुट घुट कर जीने पर मजबूर है .....................उसकी मानसिक स्तिथि भयावह होती जा रही है
    न वो ख़ुस है न उसके घर वाले .................ख़ुस अगर कोई है तो वो जिसने उसे उसके घेर से अलग कराया ...........पर वो खुशी भी ज्यादा दिन नहीं है ..........इस बात का जब तक उसे अहसास होगा तब तक पानी सर के उपर से गुजार चूका होगा....................

    यहाँ हर आदमी को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए चाहे वो घर की औरत हो या पुरुष...........क्योकि ये वो गाड़ी है जिसका अगर इक पहिया भी इधेर उधेर हुआ तो गाड़ी का संतुलन बिगड़ जायेगा ..........दोनों पहियों को अपनी- अपनी जिम्मेदारी और अपने साथ अपने उपर आश्रित लोगो की भी जिमेदारियों को निभाना है ..........तभी जीवन रूपी गाड़ी का संतुलन बना रहेगा ..........और ये अनवरत चलती रहेगी...........हा कभी कभी सर्विसिंग की जरुरत पड़ेगी..........वो तो हर गाड़ी में पड़ती है ..........चाहे वो घर की हो या ***********:)
    --
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  39. लेकिन आप के एक सहयोगी

    masum ji
    vyaktigat baat kyun
    maere kaun sahyogi haen yahaan
    mae ek swantr ekaii hun

    naam diyaa karae taaki kam sae kam bhrantiyaan ho

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  40. मासूम भाई... बात घर या बाहर के काम की नहीं है. बात यह है कि कोई महिला अगर घर पर रहकर बच्चो की परवरिश करे तो उसके मूल्यांकन कोई पैमाना ही नहीं है. क्योंकि मर्द को वेतन मिलता है, इसलिए उसके कार्य का मूल्यांकन तो वेतन से हो जाता है. मेरे विचार से हीन भावना यहीं से शुरू हुई. यह 100 प्रतिशत सच कि अक्सर मर्द सोचते हैं कि गृह कार्य भी कोई काम है, दिन भर घर पर बैठ कर आराम करते रहो... लेकिन अगर वही काम करना पड़ जाए तो नानी याद आ जाती है.

    किसी भी महिला के लिए अगर बात कैरियर और बच्चो के बेहतर मुस्तक़बिल को चुनना हो तो बिलकुल, हर एक महिला प्राथमिकता अपने औलाद की बेहतर परवरिश को ही देगी. हालाँकि घर का प्रबंधन करना तथा बच्चों की अच्छी परवरिश करना एक बेहद आवश्यक कार्य है, लेकिन फिर भी अगर कोई ना करना चाहे तो जोर-ज़बरदस्ती भी नहीं होनी चाहिए. इसमें किसी की अनिवार्यता की जगह पति-पत्नी को मिलकर निर्णय करना चाहिए कि कौन क्या काम संभालेगा.

    घर तभी चल सकता है जबकि एक घर का बॉस हो तथा दूसरा बाहर का बॉस हो... घर के बॉस को घर के लिए अंतिम निर्णय का अधिकार होना चाहिए हालाँकि दूसरे जीवन साथी से सलाह-मशविरा लेना चाहिए... वहीँ घर से बाहर के बॉस को भी दूसरे जीवन साथी से सलाह मशविरा करना ज़रूरी है, परन्तु घर के बाहर के लिए अंतिम निर्णय लेना का अधिकार उसे होना चाहिए... क्योंकि किसी भी आम कंपनी की तरह एक ही क्षेत्र के दो-दो बॉस होंगे तो काम चल ही नहीं सकता है...

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  41. रचना जी मैं किसी कि व्यक्तिगत बातों को अपने किसी लेख या टिप्पणी मैं सामने नहीं लाया करता. आप जब यह कहती है कि आप कि बात से यह सहमत है या वो तो आप स्वतंत्र इकाई नहीं रह जाती.

    आप कि बात को सही साबित करने के लिए ये कोई झूट का सहारा ले और आप खुश हो जाएं तो इसी आप की कमी कहा जाएगा. किसी व्यक्ति विशेष का नाम ले के उसको झूठा ठहराना मेरा मकसद नहीं बल्कि आप को सही राह दिखाना मेरा मकसद था इसी कारण नाम नहीं लिया. आप पुराने लेख कि टिप्पणी पढ़ें आप खुद जान जाएंगी.

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  42. शाहनवाज़ भाई ज़बरदस्ती तो ज़ुल्म है और यह किसी तरह से कहीं भी सही नहीं. कुछ लोगों का यह मानना है कि अपना कैरियर बनाने के लिए अपनी औलादों का भविष्य खतरे मैं डाल दो, बेबी सिटिंग मैं डाल के उनकी परवरिश करो. या फिर शादी ही ना करो .शारीरिक ज़रूरतों के लिए क्या किया जाए इस्पे कोई विचार उनके अभी तक नहीं मिले.
    .

    शायद ग्रहस्त जीवन का चलन अब ख़त्म होता जा रहा है. "एक दूजे के लिए " जीने कि जगह "केवल अपने लिए" जीने को आज़ादी का नाम दिया जाने लगा है.
    .

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  43. बहुत ही अच्छा और सार्थक लेख /मेरी तो ये राय है की परिवार और ग्रहस्थी चलाने की जिम्मेदारी पति-पत्नी दोनों की होती है /दोनों को ही हर काम में बराबर का सहयोग करना चाहिए/चाहे वो बच्चों की परवरिश का हो चाहे वो घर के काम का हो या बाहर के काम का/में ये मानती हूँ की संतान को औरत ही जनम देती है पर परवरिश तो दोनों मिलकर कर सकते हैं/अगर औरत सक्षम है और वो बाहर भी अच्छे प्रोफेसन में कार्य कर रही है तो केवल बच्चों और घर की जिम्मेदारियों का माध्यम बनाकर उसको रोकना ठीक नहीं है/अगर दोनों बाहर काम कर सकते है तो घर के काम और बच्चों की देखभाल भी दोनों आपसी समझदारी और मिल-बाँट कर कर सकते हैं अगर बीच में अहम् ना लायें तो /और ये ना सोचे की ये तो मेरा काम नहीं है /गृहस्थी दोनों की है.बच्चे दोनों के है,घर दोनों का है तो जिम्मेदारी भी दोनों की है /बधाई आपको इतने अच्छे लेख के लिए /

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  44. बहुत ही संतुलित और सामायिक लेख. जिसने ग्रहस्त जीवन का सुख उठाया है वो लोग अवश्य ही ऐसे लेख की सराहना करेंगे . जिनका ग्रहस्त जीवन किन्ही कारणों से सुखी नहीं है चाहे उसमें मर्द की ही ग़लती हो उनको ऐसा लगेगा की अकेले रहना ही सही है.

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  45. रचना जी से सहमत और मासूम जी से भी सहमत। लेख काबिल इ तारीफ है इस मैं कोई शक नहीं।

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  46. किसी अलग परिस्थिति में या मजबूरी में यह आवश्यक हो जाए कि पत्नी नौकरी करे या ऐसी औरत जिसके कोई औलाद नहीं, घर पे पड़े पड़े क्या करे तो यकीनन उसे भी अपने व्यापार मैं साथ देना चाहिए और नौकरी कर के कुछ और धन कमाने कि कोशिश करनी चाहिए.
    .
    लेख मैं इन्साफ किया गया है. शुक्रिया

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  47. vey correctly you concluded the article .. today time also demands that we (the two wheel of life)understand one another , otherwise life will not move correctly , and the ending will be unfortunately an accident ..
    so please if you not want to face an accident of your life please try to understand your better half ..
    thanks masoom ji .....

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  48. sangeeta puri ji se sahmat |

    i think 2 people who are going to get married - should discuss their opinions about this before they marry .

    @ जब औरत घर की जिम्मेदारियां ना संभालना चाहे तो.... आपसे किसने कहा मासूम जी कि जो स्त्रियाँ नौकरी करती हैं - वे घर की जिम्मेदारियां पूरी नहीं करतीं ? और ...
    - और जब पुरुष जिम्मेदारियां न सम्हालें तो ??? तब औरत को बाहर काम करना चाहिए ?? तब कोई दिक्कत नहीं ? आपकी कही कुछ बातें ठीक लगती हैं, अधिकतर सही नहीं लगती हैं | अधिकतर बातें स्त्रियों को पुरुषों के बनाए कायदों में बाँधने के नज़रिए से लिखी लग रही हैं |

    १) @ यदि फाईनेंशियली ज़रुरत ना हो तो शायद काम पर जाने की ज़रुरत नहीं हो |" == तो क्या जिन महिलाओं के परिवार में फाइनेंशियल ज़रुरत है उनके लिए बाहर काम करना ठीक - भले ही बच्चे नेगलेक्ट हों, भले ही बाहर शोषण हो,, परन्तु जिनके पति अच्छा कमा रहे हैं , उनके बच्चों की या उनकी इज्ज़त की वैल्यू अधिक है ? मासूम जी - यदि बुरा है -तो सबके लिए, यदि बुरा नहीं है , तो किसी के लिए नहीं है |

    २) यदि पुरुष को ऑफिस का एट्मोस्फियर पसंद न हो तो वह जॉब चेंज कर सकता है - क्या पत्नी यह कर सकती है? वह यह पति और बच्चे छोड़ दे और दूसरा कर ले ???? आप कैसे ऑफिस जॉब और घर में पत्नी के रोल को एकाकार कर रहे हैं - ????

    ३) पुरुष को अधिकार है कि वह अपनी पसंद के क्षेत्र (इंजिनियर, डॉक्टर, मेनेजमेंट आदि आदि ) को चुने - पर दुनिया की सारी स्त्रियों के लिए एक ही क्षेत्र है -? बच्चे और घर सम्हालना ? कोई और जॉब चोइस नहीं ? { यदि actually ऐसा होता तो खुदा ने स्त्री के दिमाग को पुरुषों से अलग डिजाइन किया होता , और उनमे बाहर के काम की न तो काबिलियत होती , न ही इच्छा होती |} यदि रचना जी कहें कि स्त्री को यह चोइस होनी चाहिए कि वह विवाह न करे - तो आप उन्हें नकारात्मत सोच ग्रसित आदि वाला कह देंगे !!

    ४) क्या आपको लगता है कि विवाह से पूर्व ही यह बात तय नहीं हो जाती कि जो दो व्यक्ति विवाह कर रहे हैं और जो दो परिवार एक दूजे से जुड़ रहे हैं - उनमे इस बारे में रजामंदी है या नहीं? क्या आप समझते हैं कि जितनी भी महिलाएं नौकरी कर रही हैं विवाह के बाद - वे सब अपने पति से लड़ झगड़ के या "जिद" कर के ही कर रही हैं ? उनकी तनखाह का पैसा घर के काम नहीं आ रहा ?

    ५) यदि आप यह कह रहे हैं कि विवाह के बाद जॉब "नहीं" करनी चाहिए - तो क्या आप उन पतियों को कुछ कहेंगे जो अपनी पत्नी की इच्छा न होते हुए भी उसे जॉब के लिए फ़ोर्स करते हैं - और वह पैसा भी उस के अधिकार में नहीं होता (और यह न कहियेगा कि ऐसा काम होता है - क्योंकि मैंने बहुत से केस देखे हैं जिनमे ऐसा है , शायद आपने न देखे हों, क्योंकि आपने हर वर्किंग महिला को जिद्दी और लड़ कर जॉब करने वाली की ही नज़र से देखा है , कभी दूसरी दृष्टी से सोचने की कोशिश नहीं की |

    ५) पति पत्नी के आपसी प्रेम और सामंजस्य को आपने पूरी तरह दरकिनार कर दिया है ? सिर्फ एक व्यक्ति कमाने वाली मशीन और दूसरा घर सम्हालने वाली मशीन है ?

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  49. जब बात हद से ज्यादा हो जाये तो
    मरने मारने तक आ जाती है
    लेकिन ऐसा करने के बजाय अपनी-राहे अलग-अलग पकड लेना ही उचित है।
    जो बहुत कम कर पाते है।

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  50. ह्म्म्म... कुछ बातों पर सहमत परन्तु कुछ में नहीं...
    बेशक जिद करना गलत है, फ़िर कोई भी करे... मर्द या औरत...
    जिद, फ़िर झगड़ा, फालतू का सरदर्द, एक-दूसरे को भला-बुरा कहना... और भी दुनिया जहान की बातें... परन्तु जब भी बात adjustment कि आती है तो औरत ही क्यों??? सिर्फ इसिलए क्योंकि सहनशक्ति उसे ही मिली है, बेकार की बात है ये... सामंजस्य दोनों ओर से होता है हमेशा... अब बात नौकरी करने की, आज के दौर में मंहगाई बहुत बढ़ गई है, हर चीज़ में, यहाँ तक की यदि बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहो तो वहां भी बाज़ार के भाव देखने पड़ते हैं... और ऐसे में सिर्फ एक का घर सम्भाल पाना बहुत मुश्किल है, या तो आप बिरला/अम्बानी हों... पर उनकी भी पत्नियाँ काम में हाँथ बटा रही हैं...
    अब बात घर में किसी के {सास या और किसी का} कुछ देने और बॉस की डांट सुनने में फर्क है... घर के लोग आपके अपने हैं, जब आपका अपना आपको कुछ कह दे तो ख़राब लगता है... और बॉस आपका अपना नहीं है... यही फर्क होता है अपनों और परायों में...
    अब बात रही घर और बाहर काम सँभालने की, तो इतना सहनशील भगवान ने औरत को गढ़ा है, और जो उन्होंने छोड़ दिया वो इस समाज ने बना दिया... बचपन से ही उसे adjustment की घूंटी पिलाई जाती है...

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  51. कमाल है भाई जी आप तो बहुत बढ़िया लिखते है.
    अच्छा आलेख,आभार.

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  52. शिल्पा मेहता जी संगीता जी से मैं भी सहमत और आप भी फिर भी इतने सवाल. संगीता जी कि टिप्पणी ना हो गयी कोर्ट का फैसला हो गया सभी सहमत. :) . इसके लिए सब से पहले संगीता जी को बधाई.
    .
    बाप रे इतने सवाल एक साथ. देख के हाई स्कूल के इम्तिहान याद आ गए. देखते हैं कितने नंबर आते हैं. वैसे आप टाइटल पे ना जाएं लेख को पढ़ें. सभी सवालों के जवाब हैं वहाँ. हाँ आपके अंग्रेजी मैं दिए मशविरे से १००% सहमत. सब से बढ़िया तरीका है यह.
    .
    किसी भी इंसान के लिए नौकरी भी करना और घर भी संभालना वैसा ही हैं कि प्रधानमंत्री के पास दोनों मंत्रालय हों. कुछ फर्क तो पड़ता ही काम का बोझ अधिक पड़ने पे? बहरहाल बच्चे हुए तो साथ मैं ऑफिस तो नहीं जाएंगे. वैसे भी आपके सवालों मैं यह सामने आता है की जिस घर मैं पति और पत्नी दोनों घर से बाहर जा के नौकरी करते हैं वहां बच्चों का शोषण भी हो सकता है और बच्चे नेगलेक्ट भी होए हैं.

    १ ) जी मजबूरी मैं इंसान भीख भी मांगता हाई. यह आसान और आरामदेह तो नहीं होता लेकिन क्या करे पेट तो भरना है. मतलब साफ़ है महिलाओं के लिए काम करना बाहर जा के मना नहीं बस घर कि जिम्मेदारियों को छोड़ के बाहर काम करना, जब कि फाईनेंशियली मज़बूत भी हैं. उचित नहीं.

    २ ) यदि पति और पत्नी मैं नहीं पट रही है तो अलग हुआ जा सकता है. यह पत्नी भी कर सकती है. हाँ यह औरत कि महानता है कि ना पटने के बाद भी अपनी औलाद कि खातिर सहती भी है और रहती भी है. लेकिन चाहे तो अलग हो सकती है. ऑफिस के काम से अधिक ज़िम्मेदारी का काम है घर को संभालना. किसी भी घर को बनाने मैं और बच्चों कि तरक्की मैं औरत का किरदार अधिक अहम् होता है.

    ३) यदि कोई भी कहे कि शादी इसलिए नहीं करनी क्यों कि मुझे घर के बाहर रह के अपना करियर बना ना है तो यह उसका अधिकार है परन्तु व्यावहारिक नहीं है.

    ४ ) शादी के समय यदि पति और पत्नी मैं यह तय भी हो जाए कि दोनों अपनी मर्ज़ी से नौकरी करेंगे और ओलाद बेबी सिटिंग मैं डाल दी जाए तो यह फैसला भी उचित नहीं. घर और बाहर काम काम दोनों को अपनी अपनी सलाहियतों के अनुसार बाँट लेना चाहिए.

    ५) पति और पत्नी को जो भी काम अपने पारिवारिक सुख के लिए करना है एक दूसरी कि ख़ुशी के साथ ही करना चाहिए. कोई किसी पे फाॅर्स नहीं कर सकता. शादी कि जाती है एक दुसरे के साथ रहते हुए सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए ना कि एक दूसरी पे अपनी ताक़त आज़माइश के लिए.

    ६) किसी के पास अच्छा व्यापार या नौकरी है और उसका घर भी अच्छे से चल रहा है तो वो इंसान एक सुखी इंसान कहलाता है.लेकिन इन दोनों सुखों को पाने के लिए इन्सान को बहुत सी कुर्बानियां देती पड़ती हैं, मेहनत करनी पड़ती है. इसमें औरत या मर्द का कोई सवाल नहीं आता बल्कि जैसा कि मैंने कहा अपनी अपनी सलाहियतो का इस्तेमाल करते हुए करते हुए औरत और मर्द इन सुखों को पाने कि कोशिश करते हैं.
    क्या यह काफी नहीं ...

    यदि कोई यह लिखे अपने लेख मैं कि चोरी करना उचित नहीं और टिप्पणी मैं कोई यह पूछने लगे क्या आप को सभी चोर लगते हैं तो इसे कहा जाएगा नकारात्मक सोंच. आज़ादी के नाम पे नौकरी की जिद और घर की बर्बादी की कहानी नयी नहीं और अब बहुत देखने मैं आती है. उसके लिए यदि कुछ कहा जाए तो उसमें सभी महिलाओं को शामिल कर देना भेई अकारण विवाद खड़ा करना ही समझा जाएगा.

    सारांश के तौर पे आप यह कह सकती हैं कि काम कोई भी बुरा नहीं, छोटा या बड़ा नहीं होता. पति और पत्नी को मिल जुल कर करना ही चाहिए जिद से घर उजड़ जाता है. और किसी भी काम कि जिमेदारी के पीछे तर्क व्यावहारिक होना चाहिए.

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  53. घर को किसे संभालना है , और किसे बाहर की जिम्मेदारी संभालनी है , यह प्रत्येक दंपत्ति का आपसी फैसला है इसमें दूसरों को दखल नहीं देना चाहिए स्त्री के बाहर काम करने में कोई बुराई नहीं है ...... पर बाहर के कार्यो के साथ घर की भी ज़िम्मेदारी बनती है ...आपका प्रश्न बहुत विचारणीय है

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  54. रचना जी सवाल किसी को नसीहत करने का नहीं है और मैं जानता हूं आप जो कहती हैं समझ के कहती हैं लेकिन आप का साथ देने वाले अक्सर झूट बोलते क्यों दिखाई देते हैं?

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  55. नौकरी ने नारी को एक मक़ाम दिलाया है लेकिन यह उसकी समस्याओं का वास्तविक हल नहीं है।
    अंजलि सेना में नौकरी करती थी और सेना की ट्रेनिंग नर-नारियों को फ़ौलादी जिगर वाला बना देती है लेकिन फिर भी अंजलि ने आत्महत्या कर ली ?
    ऐसा क्या बीता नौकरी के दौरान अंजलि के साथ ?
    जानने के लिए देखिए


    क्या नौकरी करने के बावजूद भी औरत को सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल पाता ?

    इस पोस्ट पर अपनी राय अवश्य दें.

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  56. मैं भी समझता हूँ कि सामंजस्य जब तक नहीं बनेगा दोनों के बीच, तब तक यह टसल रहेगी कि कौन सा काम बेहतर और इज्ज़त वाला है..
    बेहतर काम दोनों ही हैं पर उसे अपनी सोच और ज़हन में हमेशा रखना ज़रूरी है.. छुट्टी के दिन पति को भी अपनी पत्नी का घर और बच्चों के कामों में बराबर हाथ बांटना चाहिए ऐसा मुझे लगता है..
    उसे उस दिन यह कहकर मना नहीं करना चाहिए कि आज ५ दिनों के बाद छुट्टी मिली है तो वह आराम करेगा और दोस्तों के साथ घूमेगा.. यहीं असली लड़ाई शुरू हो जाती है..
    वैसे भी विवाह के ऐसा आश्रम है जो सबसे कठिन और जटिल है.. इसे किसी एक फ़ॉर्मूले से नहीं जीता जा सकता.. सबके अपने-अपने तरीके हैं.. जो जिसे सही लगे, इस्तेमाल करे.. पर खुश रहे..

    ऐसे चिंतन वाले विषयों को उठाना भी ज़रूरी है और बहस सौहार्दपूर्ण हो तो फिर क्या कहने..

    आभार
    प्रतीक

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  57. मिलजुल कर उठायें घर बाहर की जिम्मेवारियां ।
    तभी चल पायेगी संसार की सवारियां ।

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  58. कौन किस काम को करेगा इसका फैसला उनकी सलाहियत करेगी ना कि हमारी जिद |...बहुत सही कहा है आपने अालेख में।

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  59. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’शिव का देवत्व और ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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