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Friday, February 10, 2017

कर्बला मैं ऐसा क्या हुआ था की इसकी याद सभी धर्म वाले मिल के मनाते हैं.

karbalamuhalla
हर  साल  मुहर्रम  का  चाँद  दिखाई  देते  ही ,हर तरफ कर्बला, या हुसैन की सदा सुनाई देने लगती है, लोगों की ज़बान पे पैगाम है इंसानियत,सब्र ए हुसैन (ए.स) और कुर्बानियों  की कहानी फिर से सुनाई देने लगती है.
कल १० मुहर्रम आशूरा का रोज़  है जिस दिन इमाम हुसैन शहीद  हुए थे. कल मुसलमान जो ग़म ए हुसैन मनाते हैं, शाम से ही घरों  मैं चूल्हा नहीं जलाते, बिस्तर  पे आराम से नहीं सोते, दिन मैं भी शाम के पहले खाना नहीं खाते और पानी नहीं पीते.दिन भर  रोते हैं शोक सभाओं मैं बैठ के और्मतम करते हैं.  या यह कह लें की ऐसे रहते हैं जैसे अभी आज ही किसी का इन्तेकाल हुआ है. यह इतिहास की ऐसी शोकपूर्ण घटना है कि जिसकी यादें १३७० वर्ष से सारी दुनिया में लोग  मनाते हैं.


मैं   भी कल ऐसी हे किसी शोक सभा मैं बैठा मिलूँगा. आज सोंचा चलो जब ईद , दिवाली, दसहरा आप सब के साथ मिल के मनाते हैं तो मुहर्रम क्या है और क्यों मनाते हैं यह भी बताता चलूँ. क्यों की इमाम हुसैन (ए.स) की क़ुरबानी और उनका ग़म किसी धर्म विशेष की जागीर नहीं है.आज इमाम हुसैन (ए.स) की शहादत मुसलमानों का हर एक फिरका मनाता है. कोई उनकी सभा बुला के उनकी तारीफें करता मिल जाता है तो कोई काले कपडे पहन की फर्श ए अजा (शोक सभा) मिलेगा.

ज़ाहिरी तौर पे ऐसा दिखी देता है की जैसे यह मुसलमान अपने नबी के नवासे की शहादत का ग़म मना रहे हैं. लेकिन जब ध्यान से देखा तो पाया की दुनिया भर के सभी सत्यप्रेमी मानवता के पुजारियों ने हुसैन के बेजोड़ बलिदान को सराहा और श्रद्धांजलि अर्पित की है.   कभी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को कहते पाया की  "मैंने  हुसैन से सीखा है अत्याचार पर विजय कैसे प्राप्त होती  है तो कभी  है तो कभी डॉ राजेंद्र प्रसाद को कहते पाया "शहादत ए इमाम हुसैन (अस) पूरे विश्व के लिए इंसानियत का पैग़ाम है.  कभी डॉ . राधा  कृष्णन को कहते पाया " इमाम हुसैन की शहादत १३०० साल पुरानी है लेकिन  हुसैन आज भी इंसानों के दिलों पे राज करते हैं. रबिन्द्रनाथ  टगोर ने कहा सत्य की जंग अहिंसा से कैसी जीती जा सकती है इसकी मिसाल इमाम हुसैन हैं.


कितनी जगहों पर ग़ैर मुस्लिम भी इसको अपने रंग में मनाते हैं. मुहर्रम  का  चाँद  देखते  ही , ना  सिर्फ  मुसलमानों  के  दिल  और  आँखें  ग़म  ऐ हुसैन  से  छलक  उठती  हैं , बल्कि हिन्दुओं  की  बड़ी   बड़ी   शख्सियतें  भी  बारगाहे  हुस्सैनी  में  ख़ेराज ए अक़ीदत पेश  किये  बग़ैर  नहीं  रहतीं.

ऐसा क्यों है यह समझने के लिए कर्बला क्यों हुई और कर्बला मैं क्या हुआ  था इसको समझना आवश्यक है.


हज़रत मुहम्मद (स.अव) की शहादत के बाद , इस्लाम के कानून मैं बादशाहत के असरात दिखाई देने लगे , और मुसलमानों के खलीफा हज़रत अली (ए.स), जो की हज़रत मुहम्मद (स.ए.व) के दामाद भी थे उनको  माबिया ने, जो बनी उमय्या का एक सरदार और प्रभावशाली व्यक्ति था, की बग़ावत का शिकार होना पड़ा और शहीद कर दिए गए.

उनके बाद खिलाफत माबिया के हाथ मैं आ गयी. हज़रत इमाम हसन जो हज़रत अली (ए.स) के बड़े बेटे थे उनको भी माबिया  ने ज़हर दे के शहीद कर दिया गया . अपनी ज़िंदगी मैं माबिया ने अपने ज़ालिम और   दहशतगर्द बेटे यज़ीद को खलीफा बना दिया , जिसका चरित्र नितान्त दोष युक्त था. इस्लाम मे जो हराम था उसको हलाल करने की कवायद शुरू हो चुकी थी, सरकारी खज़ाना अपने फायेदे के लिए इस्तेमाल होने लगा था. जब लोगों ने आवाज़ उठाई इस फैसले के खिलाफ तो पैसे और अत्याचार से उनकी ज़बानें बंद करवा दी गईं.
माबिया के मरने   के बाद यजीद और बेलगाम हो गया और उसने हज़रत अली (ए.स) के बेटे इमाम हुसैन (ए.स) से कहा की वोह उसे अपना धार्मिक गुरु या पेशवा मान लें वरना मरने  के लिए तैयार हो जाएं.




इमाम हुसैन ने समझ लिया कि इस्लाम और सच्चाई को बचाने के लिए उन्हें जान तो देना है मगर इस तरह की दुनिया को स्पष्ट मालूम हो कि हुसैन ने क्यों जान दी ? और उनके दुश्मनों ने उन्हें क्यों मारा ? यानी सत्य और असत्य की जो लड़ाई संसार में सदैव से होती आयी है वह एक नये ढंग से लड़कर दिखाई जाय.




hijrah1इमाम हुसैन ने परिस्थिति को देखकर  मदीना छोड़ने का निश्चय कर लिया. हुसैन अपने घराने वालों के साथ मदीने से मक्का रवाना हुए.  पहले वह मक्के गये मगर वहाँ भी यज़ीद के लोग मौजूद थे जो चाहते थे कि हज के अवसर पर चुपके से इमाम हुसैन को मार डालें और अपराध किसी और , के सिर मढ़ दिया जाये. मगर हुसैन तो यह चाहते थे कि जान इस तरह दें कि दुनिया को अच्छी तरह मालूँम हो जाय कि हुसैन ने क्यों जान दी, और किसने उनको मारा ? इसलिए आप हज किये बिना ईराक की तरफ़ रवाना हो गये. ये छोटा सा क़ाफ़िला अरब की गर्मी की कठिन यात्रा के दुख झेलता हुआ चला जा रहा था. हर मंज़िल पर लोग हुसैन से आग्रह करते थे कि ख़ुदा के लिए वापिस चले जाइये, यज़ीद की शक्ति बहुत बड़ी है और उनकी सहस्त्रों की संख्या में सेनाएँ जमा हो रही हैं. मगर हुसैन मुहम्मद के नवासे और अली के बेटे थे, जिन्होने ख़ुदा के बताए रास्ते पर चलने के लिए हमेशा ख़ुशी-ख़ुशी दुख झेला था, वे अपने इरादे में अटल रहे और यात्रा की कठनाइयाँ सहन करते हुए कूफा की तरफ आगे बढ़ते रहे.
रास्ते मैं यजीद  की फ़ौज का सेनापति  हुर्र  मिला जिसने इमाम हुसैन (ए.स) को कूफा जाने से रोका. इमाम हुसैन (ए.स) ने विरोध किया लेकिन फिर मजबूरन मान ना पड़ा और यह काफिला कर्बला की और चल पड़ा. इमाम हुसैन (ए.स) का किरदार देखिये की जो  हुर्र ने उनका रास्ता बदल की यजीद की फ़ौज की तरफ ले  जा रहा था, रस्ते मैं उसकी फ़ौज मैं पानी ख़त्म हो गया तो इमाम हुसैन ने उन सभी को पानी पिलाया यहाँ तक की उस फ़ौज के जानवरों को भी सैराब किया.




मुहर्रम के महीने की 2  तारीख़ थी जब इमाम हुसैन का यह काफिला कर्बला पहुंचा और नहर ए फुरात के किनारे अपने तम्बू लगा लिए.इमाम हुसैन के साथ सत्तर-बहत्तर आदमी थे और उनमें भी कुछ बहुत बूढ़े लोग थे और कुछ नयी उम्र के लड़के, चन्द जवान और नौजवान  थे.

यजीद की फ़ौज ने इमाम के परिवार वालों का डेरा नहर के किनारे से हटवा दिया, जिस से उनको पानी ना मिल सके.


2 से 7 तक मुहर्रम तक इमाम हुसैन ,उनके भाई हज़रत अब्बास  और उनके कुछ बुज़ुर्ग साथी यज़ीद की सेना के अधिकारियों से बात-चीत करते रहे, उन्हें समझाते रहे कि तुम क्यों निर्दोषों का ख़ून अपने सिर लेते हो. हुसैन ने यह भी कहा कि मुझे यज़ीद के पास ले चलो, मैं स्वंय उससे बात-चीत कर लूँगा.  ये रिवायत भी है कि उन्होने ने कहा, मैं किसी और देश,  हिन्दुस्तान की ओर चला जाना चाहता हूँ जहाँ मुसलमान तो नहीं लेकिन इंसान रहते हैं . मगर इन अधिकारियों को सख़्ती से यह आदेश दिया गया था कि या हुसैन और उनके परिवार को कहीं ना जाने दिया जाए.

7 मुहर्रम से यज़ीद की फौजों ने नदी पर पहरा बिठा दिया और हुसैन की फौजों तक पानी का पहुँचना बन्द हो गया और खाद्य-सामग्री के रास्तों की नाका बंदी कर दी गयी. वह समझते थे कि हुसैन और उनके साथी अगर और किसी तरह से नहीं दब सकते तो नन्हें बच्चों और औरतों की भूख प्यास तो उनको झुका ही देगी।.मगर वे क्या जानते थे कि हुसैन का सिर कट सकता है, अत्याचार और झूठ के सामने झुक नहीं सकता.
फिर मुहर्रम की रात आगयी जब यह तै हो गया की यजीद के तीस हज़ार के लश्कर से हुसैन (ए.स) के ७२ की जंग होगी.

इमाम हुसैन (ए.स) ने रात मैं रौशनी बुझा दी और अपने साथियों से इमाम ने कहा "मैं किसी के साथियो को अपने साथियो से ज़्यादा वफादार और बेहतर नहीं समझता  कल का दिन हमारे और इन दुश्मनो के मुकाबले का है मैं तुम सब को बखुशी इजाज़त देता हूँ की रात के अंधेरे मे यहा से चले जाओ मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं होगी, यह लोग सिर्फ मेरे खून के प्यासे है,यजीद के फौजी उसको जाने भी देंगे जो मेरा साथ छोड़ के जाना चाहेगा. कुछ समय बाद रौशनी फिर से कर दी गयी और देखा की एक भी साथी इमाम हुसैन का उनका साथ छोड़ के नहीं गया. इतिहास साढ़े तेरह सौ वर्ष से इस पर चकित है की इमाम हुसैन (ए.स) मैं ऐसा क्या था की आज्ञा देने के बाद भी कोई उनका साथ छोड़ के नहीं गया. उस से भी अधिक आश्चर्य की बात यह की जो हुर्र यजीद का सेनापति था, जिसने हुसैन का रास्ता कूफा से कर्बला की और मोड़ा था, जिसने इमाम पे पानी ७ मुहर्रम से बंद कर दिया था , उसी शाम अँधेरे मैं इमाम हुसैन (ए.स) के पास आ गया और क़ुरबानी देने की इजाज़त मांगी.


जावेद बदायुनी ने कहा :
दिल   की  आवाज़  भी  है  ज़हन  की  परवाज़  भी  है 
“हुर्र ”! यह  हिजरत  तेरा   अंजाम  भी  आग़ाज़  भी  है 
लाश .ए  “अब्बास ” पे  रो  रो  के  वफाओं  ने  कहा 
तेरे  मरने  पे  हमें  रुंज  भी  है  नाज़  भी  है
 
१० मुहर्रम की सुबह आये, सभी नमाज़ मैं खड़े हो गए, लश्कर के यजीद की तरफ से तीरों की वर्षा होना शुरू हो गयी और ३० लोग नमाज़ पढ़ते मैं ही शहीद हो गए.

फिर जंग मैं यजीद की फ़ौज ले लड़ने एक एक कर के लोग जाते रहे . सबसे पहले हुसैन के साथियों ने लड़ाई में जान क़ुर्बान की, जिसमें इमाम के बूढ़े दोस्त हबीब इब्ने मज़ाहिर और जनाब ए हुर्र भी थे.
फिर इमाम हुसैन के रिश्तेदारों की बरी आयी. जिसमें इमाम का भतीजा कासिम और भांजे ऑन ओ  मुहम्मद , भाई हज़रत अब्बास (लश्कर के सेनापानी) , बेटा अली अकबर भी थे.
उनकी माएं अपने बेटों को सजा के , सिपाही की तरह भेजती थीं और बादLadies-mourning-at-Karbala शहादत ५७(56 साल 5 महीने और 5 दिन) साल के भूखे  प्यासे इमाम हुसैन (ए.स) ,सभी को लेके खेमे (तम्बू) मैं ले आते थे.इनमें से किसी का भी जिस्म पूरा ना आया खेमे मैं.
अपने बेटे, भाई, भतीजों के लाशे देखे के औरतें रोती और मातम करती थीं और दूसरे बेटे को शहीद होने के लिए तैयार किया करती थी.
जब सब शहीद हो गए तो इमाम हुसैन (ए.स) ने फ़ौज ए यजीद से कहा, तुम्हारा मुजरिम मैं हूँ, मेरा  बेटा ६ महीने का है, प्यासा है, एक काम करो इसको पानी दे दो , चाहे बाद मैं मुझे मार देना. पानी के सवाल पर यज़ीदी-सेना ने तीर बरसाये। बच्चे की गरदन पर तीर बैठा और वह बाप के हाथों में ख़त्म हो गया.




अब इमाम हुसैन (ए.स) और उनके बड़े बेटे इमाम सज्जाद ही बचे थे. इमाम सज्जाद बीमार थे और बेहोश थे. इमाम हुसैन (ए.स) ने बेटे सज्जाद को हिलाया और कहा बेटा सब शहीद  हो चुके, तुममें जंग करने की ताक़त नहीं, अब मैं जाता हूँ शहीद होने ऐ  बेटा परेशानिओ का सामना करते करते जब कभी  मदीना पहुचना तो सब से नाना जान ( मोहम्मद साहब) के रौजे (कब्र) पर जाना, मेरा सलाम कहना और सारा आंखो देखा हाल सुनना, फिर मेरी माँ सय्यदा फातिमा की कब्र पर जाना और मेरा सलाम कहना फिर मेरे भाई हज़रत हसन की कब्र पर जाना और मेरा सलाम कहना,, मेरे बाद तुम ही मेरे जाँ नशीन हो !! इसके बाद इमाम हुसैन ने अपना साफा ( पगड़ी ) इमाम जाइनुल आबीदीन को पहनाया और वापस बिस्तर पर लिटा दिया

इमाम हुसैन (ए.स) ने अपना रुख मैदान ए जंग की तरफ किया. जंग के पहले अल्लाह से दुआ की और इसके बाद इमाम हुसैन ने याजीदी फौज को मुखातिब करते हुए कहा कि बताओ तुम लोग मेरे खून के प्यासे क्यो हो, क्या मैंने किसी को कत्ल किया ? या किसी का माल बर्बाद किया ? या किसी को ज़ख्मी किया जिसका तुम मुझ से बदला लेना चाहते हो ,, इन बातों का याजीदी फौज के पास कोई जवाब न था ! जब फ़ौज ने कुछ ना सुना इमाम हुसैन (ए.स) ने भी जंग शुरू की  और लश्कर ए यजीद से जंग करते रहे  . उनके जिस्म पे इतने तीर लगे थे की जब शाम(असर)  का वक़्त होने को आया, इमाम हुसैन (ए.स) ने नमाज़ के लिए घोड़े से उतेरना चाहा तो उनका शरीर ज़मीं पे ना आया बल्कि तीरों पे टिका रहा.इमाम ने सजदे मैं सर को झुकाया . शिमर ने प्यासा , इमाम के गले पे कुंद खाजेर चला के सर अलग किया, जश्न मनाया जाने लगा.
इस तरह करबला की यह छोटी सी बस्ती जो २ मुहर्रम को बसी थी 10 मुहर्रम को उजड़ गयी.




इमाम  के खेमे मैं आग लगा दी गयी, शहीदों के सिर काट लिए कि यज़ीद को पेश करेंगे और इनाम  लेंगे. औरतों बच्चों और बीमार इमाम सजाद को  ज़ंजीर, हथकड़ी और बेदी पहना के कोड़े मारते १६०० किलोमीटर दमिश्क़ तक, जो यज़ीद की राजधानी थी, ले गये और वहाँ क़ैद कर दिया गया.

जावेद बदायुनी ने कहा :
जलते  खेमों  पे  अदू  खुश  है  उसे  क्या  मालूम
यह  धुवां  जंग  का  अंजाम  भी  आग़ाज़  भी  है 


karbala यह इतिहास की ऐसी शोकपूर्ण घटना है कि जिसकी यादें साढ़े तेरह सौ वर्ष से मुसलमान और  ग़ैर  मुसलमान  सभी  मनाते हैं. बिहार,उडीसाऔर उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर हिंदू ताज़िए के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं. बिहार के सिवान ज़िले के हसनपुरा गाँव के नानकशाही मठ से पिछले तीन सौ वर्षों से ताज़िया जुलूस निकाला जाता है जहाँ आज महंत रामदास पूरी श्रद्धा के साथ ताज़िए को कंधा  देते हैं .हमारे ब्लोगर भाई सिद्धार्थ   त्रिपाठी ने अपने गाँव मैं ताज़िया मेले का विवरण अच्छे अंदाज़ मैं दिया है. "
और बड़वानी जिले के राजपुर में तहसील मुख्यालय पर पचास से अधिक वर्षों से ताजिए बना रहे गरीब हिन्दू परिवारों ने यह संदेश दिया है कि गम का रिश्ता किसी कौम विशेष से नहीं है।
मुंशी प्रेमचंद जी  ने  किसी  समय  हजरत  इमाम  हुसैन  की  शहादत  से  प्रभावित  होकर "कर्बला" नाटक लिखा था। उन्होंने इसमें ऐतिहासिक तथ्य दिया था कि कर्बला की लड़ाई में कुछ हिन्दू योद्धाओं ने भी हजरत हुसैन के पक्ष में युद्ध कर प्राणोत्सर्ग किया था.

बहुत ही मशहूर है की  हिन्द से एक ब्राह्मण जिनका नाम रहिब दत्त था  इमाम हुसैन की तरफ से याजीदियों से लड़े थे और हिंदी रतनसेन का किस्सा भी बहुत मशहूर  है जो फिर कभी बात चली तो बताऊंगा .
शायद इसी लिए हज़रत मुहम्मद (स.अव) साहब कहा करते थे" “हिंद से मुझे मुहब्बत की खुशबू आती है”
इमाम हुसैन ने  शहादत दे के  पूरी दुनिया तो यह  पैगाम दिया है की ज़ुल्म और  ज़बरदस्ती के आगे किसी भी हाल मे झुकना नहीं चाहिए, सच्चाई और ईमानदारी के लिए हमेशा  कुरबानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए. आज दुनिया मे १३७० साल से हर साल इमाम हुसैन (ए.स) की क़ुरबानी याद करके आज भी लोग रोते है जबकि याजीद का नाम लेवा कोई नहीं है.

आज  अगर इंसानियत, बन्दगी, दोस्ती, दूसरों की ख़िदमत, कमज़ोरों की मदद , मज़लूमों की तरफ़दारी ,समाज मैं अमन और शांति का जज़्बा हम में पाया जाता है तो यह सब इमाम हुसैन (अ) की क़ुर्बनिओन का नतीजा है.


विश्व का कोई भी ऐसा देश नही है, जहां हुसैन के त्याग व बलिदान की याद न की जाती हो। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई श्रद्धा के साथ हुसैन का नाम लेता है.
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26 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत अच्छी जानकारी मिली। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    आज की कविता का अभिव्‍यंजना कौशल

    ReplyDelete
  2. zeashan zaidi ने कहा…
    आपने कर्बला की हकीकत बहुत कम अलफ़ाज़ में बहुत अच्छी तरह बयान की

    ReplyDelete
  3. अरविन्द जांगिड ने कहा…
    विस्तृत जानकारी, सुन्दर रचना, साधुवाद

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  4. सतीश सक्सेना ने कहा…
    " डॉ राजेंद्र प्रसाद को कहते पाया "शहादत ए इमाम हुसैन (अस) पूरे विश्व के लिए इंसानियत का पैग़ाम है. कभी डॉ . राधा कृष्णन को कहते पाया " इमाम हुसैन की शहादत १३०० साल पुरानी है लेकिन हुसैन आज भी इंसानों के दिलों पे राज करते हैं. रबिन्द्रनाथ टगोर ने कहा सत्य की जंग अहिंसा से कैसी जीती जा सकती है इसकी मिसाल इमाम हुसैन हैं. "

    प्यारा मैसेज दिया है आपने, आभार ! इमाम हुसैन के लिए सबके मन में श्रद्धा रही है उनपर केवल आपका ही हक़ नहीं था ! पूरी इंसानियत के थे हुसैन ...
    हार्दिक आभार इस लेख के लिए !

    ReplyDelete
  5. विस्तार से जानकारी देने का शुक्रिया .. हार्दिक शुभकामनाएं ...

    ReplyDelete
  6. बहुत अच्छी जानकारी मिली।
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    ReplyDelete
  7. लाजवाब..हाए हुसैन

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  8. हिन्द से एक ब्राह्मण जिनका नाम रहिब दत्त था इमाम हुसैन की तरफ से याजीदियों से लड़े थे और हिंदी रतनसेन का किस्सा भी बहुत मशहूर है जो फिर कभी बात चली तो बताऊंगा .

    ..
    इंतज़ार रहेगा

    ReplyDelete
  9. हिन्द से एक ब्राह्मण जिनका नाम रहिब दत्त था इमाम हुसैन की तरफ से याजीदियों से लड़े थे और हिंदी रतनसेन का किस्सा भी बहुत मशहूर है जो फिर कभी बात चली तो बताऊंगा .

    ..
    इंतज़ार रहेगा

    ReplyDelete
  10. कर्बला की कहानी सुनकर ही रोएँ कांपने लगते हैं, बड़ी मुश्किल से कई बार के प्रयास में विफल होने के बाद ही यह लेख पूरा पढ़ पाया हूँ. आपका बहुत बड़ा शुक्रगुजार हूँ कि आपने कुर्बानी कि यह बेहतरीन मिसाल सबके सामने रखी. यह वाकया बताता है कि किस तरह सर कटाए गए लेकिन ज़ुल्म के सामने झुकना कुबूल न हुआ....

    जंग-ए-कर्बला के इस वाकिये में एक बहुत ही अजीब बात है..... जो जीतता हुआ दिखाई दिया असल में वह हार गया और जो बजाहिर हारता हुआ दिखाई दे रहा है वह ना सिर्फ जीत गया बल्कि क़यामत तक के लिए अपनी मुहब्बत को करोडो-अरबों लोगों के दिलों में बसा गया...

    असल में हक पर चलने वालों की हमेशा ही जीत होती है...

    ReplyDelete
  11. .

    इस बेहतरीन जानकारी के लिए आभार ।

    .

    ReplyDelete
  12. इस विषय पर मेरा ज्ञान बहुत थोडा था. विस्तृत जानकारी देने के लिए धन्यवाद.

    ReplyDelete
  13. आदरणीय एस.एम.मासूम जी
    नमस्कार !
    बहुत अच्छी जानकारी मिली।
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ

    ReplyDelete
  14. VICHAAR SHOONYA जी और संजय जी आपका आभार

    ReplyDelete
  15. बहुत अच्छी जानकारी दी आप ने, लेकिन इन दिनो जब मुस्लिम भाई आपस मै मिलते हे तो एक दुसरे को क्या कहते हे, ऎसा इस लिये पुछ रहा हुं ताकि हम भी आप को उसी शव्द को कह कर आप का धन्यवाद करे, जेसे दिवाली ओर ईद पर हम कहते हे, वेसे ही इस समय क्या कहते हे, जरुर बताये, क्योकि मैने अपने पकिस्तानी दोस्त को एक बार इस मोके पर मुबारक वाद कह दिया था, जब कि मुझे इस के बारे जानकारी नही थी, आज आप के लेख से पता चला.

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  16. ये शहादत की दास्तान बहुत ही दर्दनाक व रोंगटे खड़े कर देने वाली है...इस जानकारी के लिए बस शुक्रिया...इससे पहले शहादत की बात तो पता थी पर इतनी विस्तार से नहीं पता थी....

    http://veenakesur.blogspot.com/

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  17. बहुत अच्छी जानकारी........आभार..

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  18. राज भाटिया जी सबसे पहले तो आप का शुक्रिया की आपने लेख को पढ़ा. आप का सवाल बहुत ही पसंद आया और उसको पूछने का मकसद भी ,काबिल ए तारीफ है.
    पहली मुहर्रम मुसलमानों का नया साल है, अधिकतर मुसलमान इमाम हुसैन (अ.स०) की शहादत की वजह से नया साल मुबारक नहीं कहते. केवल बोहरा मुस्लिम २ मुहर्रम से पहले पहले नया साल मुबारक कहते हैं. बाकी दिन मुहर्रम के कोई वही हमेशा वाला सलाम अलिकुम ही कहते हैं. केवल आशूरा का दिन जो की दस मुहर्रम का दिन हुआ करता है. या यह समझ लें की जिस दिन मुहर्रम की छुट्टी होती है उस दिन, को ग़म का दिन कहते हैं, और मुसलमान उस दिन सलाम भी नहीं करते बस मिलने पे "हाए हुसैन" कहते हैं.
    आप जैसे नेक मित्रों के लिए यही सलाह है, जैसे साल भर विश दोस्तों को करते हैं वैसे ही करें बस ख़ुशी का इज़हार न करें, क्योंकि मुहर्रम कोई त्यौहार नहीं है..
    आप का एक बार फिर से शुक्रिया राज साहब

    ReplyDelete
  19. मनोज जी आपकी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद्
    .
    सतीश जी आप के शब् नहुत पसंद आये की "इमाम हुसैन के लिए सबके मन में श्रद्धा रही है उनपर केवल आपका ही हक़ नहीं था ! पूरी इंसानियत के थे हुसैन"
    काश यह बात सभी समझ जाते तो आज इंसानों का का राज होता.
    .

    दिगम्बर नासवा जी आपने इस विस्तार जानकारी को पढ़ा ,आप का शुक्रिया.
    .
    Surendra Singh भम्बू जी आप का भी शुक्रिया.अवश्य आपके ब्लॉग पे आऊंगा.

    .

    सोने की चिडिया जी, कभी ज़िक्र आया तो अवश्य बताऊंगा.
    .

    दिव्या जी, संजय जी ,उपेन्द्र जी आप का शुक्रिया.
    .
    वीणा जी आप को कुछ ऐसा मिला जो आप को नहीं मालूम था, मुझे ख़ुशी हुई. आप ने ब्लॉग को पसंद किया follow किया इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद्.

    ReplyDelete
  20. बुज़ुर्गाने दारूल उलूम देवबंद बसीरत व तहक़ीक़ की रौशनी में हज़रत सय्यदना हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नज़रिये को बरहक़ और यज़ीदियों के मौक़फ़ को नफ़्सानियत पर मब्नी समझते हैं ।
    -मौलाना मुहम्मद सालिम क़ासमी , शहीदे कर्बला और यज़ीद नामक उर्दू किताब की भूमिका में , लेखक : मौलाना क़ारी तय्यब साहब रह. मोहतमिम दारूल उलूम देवबंद उ.प्र.

    इसलिए अक़ाएद अहले सुन्नत व अलजमाअत के मुताबिक़ उनका अदब व अहतराम , उनसे मुहब्बत व अक़ीदत रखना , उनके बारे में बदगोई , बदज़नी बदकलामी और बदएतमादी से बचना फ़रीज़ा ए शरई है और उनके हक़ में बदगोई और बदएतमादी रखने वाला फ़ासिक़ व फ़ाजिर है ।
    -(शहीदे कर्बला और यज़ीद ; पृष्ठ 148)

    पूरी किताब को पेश कर देना तो फ़िलहाल मेरे लिए मुमकिन नहीं है और न ही कोई एक किताब हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की तालीमात , उनके किरदार या उनकी क़ुर्बानियों को बयान करने के लिए ही काफ़ी है लेकिन किताब में जो कहा गया है कि इमाम हुसैन का नज़रिया और मार्ग हक़ था वह हरेक फ़िरक़ापरस्ती , गुमराही और आतंकवाद के ख़ात्मे के लिए काफ़ी है ।
    शहादते हुसैन का फ़ैज़ सिर्फ़ किसी एक मत या नस्ल या किसी एक इलाक़े के लोगों को ही नहीं पहुंचा बल्कि सारी दुनिया को पहुंचा और रहती दुनिया तक पहुंचता रहेगा ।
    नालायक़ और ज़ालिम हाकिम आज भी दुनिया के अक्सर देशों पर बिना हक़ क़ाबिज़ हैं और इसकी वजह यही है कि आम लोगों शहीदों के प्रति श्रद्धा तो रखते हैं लेकिन उनके आदर्श का अनुसरण नहीं करते । मौत यज़ीद की हुई है लेकिन ज़ुल्म का सिलसिला आज भी जारी है। नफ़रतें और अदावत बड़े पैमाने पर आतंकवाद की शक्ल ले चुका है और लालच भ्रष्टाचार की । यही नफ़रतेँ, अदावतें और भ्रष्टाचार आज हर परिवार में घर कर चुका है । अक्सर आदमियों ने परलोक के स्वर्ग नर्क और ईश्वर को मन का वहम समझ लिया है । जिसके नतीजे में वे अमर और अनंत ऐश्वर्यशाली जीवन की आशा खोकर दुनिया की ऐश के लिए जी रहे हैं। जो लोग ऐश के लिए जीते हैं वे कुर्बानी देने और कष्ट उठाने से हमेशा घबराया करते हैं। आज समाज में जितने भी जुर्म पाप और ख़राबियां हैं उनके पीछे कोई एक आदमी नहीं है बल्कि पूरे समाज की ग़लत सोच ज़िम्मेदार है । 10 मौहर्रम का दिन एक बोध दिवस है। इस अवसर पर आदमी अपने ज़िंदगी के मक़सद और उसे पाने के मार्ग को जान सकता है।
    आदर्श व्यक्तित्व केवल तारीफ़ नहीं चाहता बल्कि वह चाहता है कि लोग भी उस श्रेष्ठ मार्ग पर चलें जिस पर कि वह चल रहा है ।
    हम जिस व्यक्ति को श्रेष्ठ और आदर्श मानते, क्या उसके सिद्धांत और मार्ग पर चलते हैं ?
    आज हमें ख़ुद से यही सवाल करना है, अपने कल्याण के लिए, सबके कल्याण के लिए !

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  21. "इस्लाम ज़िन्दा हो गया है कर्बला के बाद"
    आले रसूल की कुर्बानियां ता क़यामत याद रख्खी जाएगी और यज़ीदियत
    हर दौर में ज़लील-ओ-ख्वार होगी | किसी ने खूब कहा है :
    इंसान को बेदार तो हो लेने दो , हर शख्श पुकारेगा हमारे हैं हुसैन ||
    डॉ. ग़ुलाम मुर्तजा शरीफ
    अमेरिका

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  22. शहादत की कहानी तो पता थी, अपने शहर के ताजिये मे शरीक भी हुअा हुं. अाज अापने विस्तार से बाताया...आभार!

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  23. assalamualekum sir ... aapne shahadat ka waqiye ki kai unjaani baato ko bataya or bahut kam alfaazo me wahi sensivity create ki h jo ki har hussaini ke dil me hoti h..

    mera aap se ek sawal h ... jis tarah aaj kal logo me tajiye lejaate waqt jo maahol rahata h ..wo kahi na kahi soch badalne ko majboor kar deta h .. Islam me ye mahina ek gumnaak mahina h jiske kam az kam shuruaati 13 din to hume har wo chiz se door rhna chahiye jisse ki hum aam dino me istemal karte h ya jin aaramo ki aadate h.. lekin mjhe ye dekh kar bada taajjub or heraani hoti h ki yome ashura ke din bhi humari quom ke logo me gamzada wala sense na hokar ek julus numa sense hota h .. humari bahan batiya gharo se makeup me nikaltii h or tajiyo ko dekhne jaati h .. nojawan log apne jism ko isliye nhi chhedte ki Imam Hussain ne karbala me zakhm khaaye the balki unka attitude ye rahta he ki hum bhi jawan h or is tarah ke stunt kar sakte h .. bahut kam logo me wo hussaini zazba hota h ..zyadatar sirf dikhaawwa hi karte h .. unhe log dekh rhe h or unki waah waahi ho rhi h isi me wo khush hote h ... mujhe taajiyo ko dafan kiye hue karib 10 saal ho gye .. last tym jab me gya tha tab 16 saal ka tha or mera dil ro pada jab mene dekha ki yome aashura k din maatam na hokar jashn ho rha h .. log maatami dhuno ko baja to rahe h lekin ENJOYMENT ke saath.. Hussaini zazba to door door tak nhi dikhaayi deta ..
    ye scene amooman har us shahar me dekhne ko mil jayega jaha humare jese Sunniyo ki jamaat Tajiye ko supurd.e.khaak ya aab karte h .. Me jab bohara quom ya shia quom ko in dino dekhta hu to mujhe apne sunni bhaiyo or rahnumaao per taras aata h or afsos hota h ki wo jo is samaj ki perwi bade zor.o.shor se karte h .. taqrire karte h .. shiao or digar mazahib per tone kaste h wo apni salahiyat or apni quom ki salahiyat ku nhi karte ..
    mera aapse ye hi sawal h ki quom ne Yome Ashura ko ek gamgeen din ki tarah na lekar ek Jashn numa din ki tarah liya hua h .. ye kaha tak sahi h or is ke muttaliq kis tarah quom ko rahnnumaai di jaa sakti h ..?
    shukria

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  24. एक बात समझ में नहीं आती कि सहादत सिर्फ हजरत हुसैन की ही क्यों मनाई जाती है जबकि पैगम्बर मुहम्मद सल्ललाहो अलैहिवसल्लम कई हकीकी चाचा हजरत हमजा रजिअल्लाहू अन्हु की भी दर्दनाक शहादत हुई थी. सही बात तो यह है कि इस्लाम मैं मुहर्रम की तरह मातम मनाना हराम और गुनाह है.

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  25. Paghambar Muhammad SAW kai haquiqi chacha Hadrat Hamza Razi-allalhu anhu ki bhi dardnak sha-hadat hui thi. Sahih baat to yeh hai ki Islam mein maatam manaana haram aur gunah hai.

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Item Reviewed: कर्बला मैं ऐसा क्या हुआ था की इसकी याद सभी धर्म वाले मिल के मनाते हैं. 9 out of 10 based on 10 ratings. 9 user reviews.
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